नीतिवचन 12:23
चतुर मनुष्य ज्ञान को प्रगट नहीं करता है, परन्तु मूढ़ अपने मन की मूढ़ता ऊँचे शब्द से प्रचार करता है।
बुद्धिमान मनुष्य अपना मुंह बंद रख सकता है, तब भी जब वह समूह में किसी से भी किसी विषय पर अधिक जानता हो। परन्तु मूढ़ अपना मुंह बंद नहीं रख सकता, तब भी जब वह मूल रूप से कुछ भी नहीं जानता, क्योंकि उसका मन ललचाता है कि वह मूढ़ता की बातें करता रहे। क्या सुलैमान जीभ को लेकर अपनी फटकार कभी ख़त्म नहीं करेगा, या शरीर के इस बेक़ाबू अंग के बारे में उसकी आग्रहपूर्ण चेतावनी आवश्यक है?
जीभ, शरीर का वह अंग जिससे आप बोलते हैं, बुराई और विपत्ति का एक बड़ा स्रोत है। नीतिवचन की पुस्तक और बाइबल में अन्य स्थानों पर कई वचन हैं जो आपकी वाणी को लेकर आपको सुधारने और सिखाने के विषय को संबोधित करते हैं। इसके कई कारण हैं : शब्दों से वाक्यरचना करना आसान है, आप दूसरों को आसानी से चोट पहुँचा सकते हैं, आप आसानी से खुद को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं, और आप अपनी घिनौनी वाणी से प्रभु यीशु मसीह की नामधराई करते हैं।
चतुर मनुष्य बुद्धिमान होता है। वह जानता है कि कब क्या करना है, और कैसे करना है। उसके पास ज्ञान है, लेकिन वह इसे आसानी से प्रकट नहीं करता। यदि वह किसी विषय को जानता भी है, तौभी खुद को छोटा समझने की उसकी प्रवृत्ति उसे उस विषय पर बात करने से रोकती है (नीतिवचन 29:11)। यदि वह किसी मनुष्य की असफलता को जानता है, तो प्रेम उसे उसकी असफलता को इधर-उधर फैलाने से रोकता है (नीतिवचन 11:13)। यदि वह किसी की आँख में तिनका देखता है, तो वह तब तक धीरज धरता है जब तक कि वह अपनी आँख से लट्ठा निकाल न ले (मत्ती 7:5)। यदि वह उपहास करने वालों से मिलता है, तो वह अपने मोती (श्रेष्ठ बोल) बरबाद नहीं करता (नीतिवचन 9:8; 23:9; मत्ती 7:6)।
चतुर मनुष्य आम तौर पर एक संयमित मनुष्य होता है (नीतिवचन 17:27-28)। वह सिर्फ तब बोलता है जब उससे बात की जाती है, लेकिन वह दूसरों के पूछे बिना यहाँ-वहाँ अपनी राय नहीं देता फिरता। वह जानता है कि जहाँ शब्द बहुत होते हैं वह यकीनन बहुत पाप छिपा होता है, इसलिए वह अपने शब्दों को कम कर देता है (नीतिवचन 10:19)। वह जानता है कि बोलने की अपेक्षा सुनना बेहतर है जिसके कई कारण होते हैं (याकूब 1:19-20)। इस मनुष्य को भीड़ में पहचानना आसान है, क्योंकि वह आसानी से बात करने से ज़्यादा ध्यान से सुनेगा।
लेकिन मूढ़ के दिल में आग होती है जो उसकी जीभ को जलजला बना देती है! यह आग नरक से आती है (याकूब 3:1-12)। मूढ़ की जीभ के अपने भयानक अभियोग में याकूब ने कोई कसर नहीं छोड़ी। यह अधर्म की दुनिया है, लेकिन मूढ़ को इसका इस्तेमाल करना प्रिय लगता है। भीड़ में भी उसे पहचानना आसान है, क्योंकि वह बोलना बंद नहीं कर सकता, और उसके शब्द सिर्फ मूढ़तापूर्ण बकवास होते हैं (सभोपदेशक 10:3,12-14)। यीशु ने यह कहकर इंसानी मन की भूमिका को समझने में मदद की कि मुँह से निकलनेवाले सब शब्द मन से ही आते हैं (लूका 6:45)।
मूढ़ हमेशा अपनी राय देता फिरता है, हालाँकि सुनने वाले जल्दी ही समझ जाते हैं कि वह नहीं जानता कि वह किस बारे में बात कर रहा है (नीतिवचन 15:28)। उसे बात करनी ही होती है इसलिए वह अपनी महान अज्ञानता की पुष्टि करता फिरता है। मूढ़ दूसरों की असफलताओं की डंका बजाता, क्योंकि उसके पास अपने शब्दों को काबू में रखने की शक्ति नहीं है। उसके लिए बकबक और कानाफूसी ज़रूरी होता है। वह किसी को भी उनकी और दूसरों की आँखों में धूल के कण के बारे में बताने में खुश होता है, भले ही उसकी अपनी आँख में पुरे खलिहान के लट्ठे गंभीर रूप से बिखरे हों।
हमारा धन्य प्रभु यीशु मसीह बहुत चतुर था (यशायाह 52:13)। वह बिलकुल भी खुद को ऊँचा उठाता नहीं फिरता था (मत्ती 8:4; 16:20; 11:29; 12:18-21)। वह जानता था कि कब बोलना है और कब नहीं, जबकि वह सबकुछ जानता था (यशायाह 50:4; यूहन्ना 2:24-25)। बुद्धि और संयम का यह संयोजन उसके उत्तम चरित्र को दर्शाता है। पाठक, आज ही उसके पवित्र आदर्श पर चलना आरम्भ करें!
नीतिवचन और उनकी व्याख्या हर दिन मुफ़्त पाएँ। चैनल खोलें, “फ़ॉलो करें” पर टैप करें और नोटिफ़िकेशन की घंटी चालू करें।