नीतिवचन 12:18
ऐसे लोग हैं जिनका बिना सोच–विचार का बोलना तलवार के समान चुभता है, परन्तु बुद्धिमान के बोलने से लोग चंगे होते हैं।
यहां एक अनमोल और शक्तिशाली नीतिवचन है, और बताता है कि किस प्रकार आप दूसरों के लिए या तो एक बड़ा ख़तरा या बड़े कल्याणकारी बन सकते हैं। आपका बोलना आपके आपके शरीर के अन्य किसी भी हिस्से की तुलना में या तो अधिक संकट या अधिक भलाई, या अधिक दर्द या अधिक लाभ का कारण बन सकता है। जो बुद्धिमान होते हैं वे अपनी जीभ को वश में रखना सीखते हैं, और केवल ऐसे वचन बोलते हैं जिनसे दूसरों की मदद हो।
जब आप बातचीत समाप्त करते हैं, तब क्या दूसरों के दिल से खून बहता है या उनकी उन्नति होती है? क्या दूसरों को आपसे बातें करना अच्छा लगता है, क्योंकि आपकी बातें उनके लिए प्रसन्नदायक और लाभदायक है? या क्या वे आपसे बातें करने से बचते हैं, क्योंकि उन्हें आपके मुंह के कठोर और घायल करनेवाले शब्दों से डर लगता है ? क्या दूसरे आपको अपनी बातों से लहूलुहान कर देते हैं? क्या उनमें से कुछ आपको प्रोत्साहित करते हैं और आपकी उन्नति करते हैं? मनुष्य के मुंह से निकलनेवाले शब्द उसके दिल को प्रकट करते हैं (नीतिवचन 10:20; मत्ती 12:34-37)। बुद्धिमान लोग अपने मुंह से विद्या देते हैं (नीतिवचन 16:23), और वे दूसरों की तलवारों से बचते हैं (नीतिवचन 9:7-8; 16:27; 21:19; 23:9)।
जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं (नीतिवचन 18:21)। जैसे तलवार की धार से, वैसे ही आप किसी व्यक्ति को अपने शब्दों से लहूलुहान कर सकते हैं, या फिर आप अनुग्रहपूर्ण और तसल्लीपूर्ण वचन बोलकर उसके घाओं को चंगा कर सकते हैं और उसमें नई जान डाल सकते हैं। आप इन दो बातों में से किसमें सर्वश्रेष्ठ हैं? आप इन दो बातों में से किस बात के लिए जाने जाते हैं? आप अपने मुंह के शब्दों से इनमें से कौन-सा नतीजा चाहते हैं? आपके घनिष्ठ मित्रों की संख्या सच में प्रकट करती है कि आप किस प्रकार के वक्ता हैं (नीतिवचन 18:24)।
जीभ तो बेलगाम बुराई है; यह अधर्म का संसार है; यह सारे शरीर को अशुद्ध कर देती है; यह प्रकृति के क्रम में आग लगाने में सक्षम है; यह नरक की आग है; यह घातक जहर से भरी है। जंगली जानवरों को वश में किया जा सकता है और प्रशिक्षित किया जा सकता है, लेकिन जीभ को कभी भी वश में नहीं किया जा सकता। यदि आप इसे वश में कर पाएं, तो आप एक पराक्रमी सिद्ध पुरुष होंगे। परमेश्वर आत्म-सम्मान की आधुनिक परिभाषा को ठुकराता है और आपकी जीभ की भर्त्सना करता है (याकूब 3:1-12)।
लोगों के और मुंह की वाणी के दो प्रकार होते हैं। कुछ लोग केवल कठोर शब्द बोलना जानते हैं, जबकि कुछ आमतौर पर या हमेशा अपनी बातों और लहज़े में अनुग्रहपूर्ण होते हैं। कटु और निर्दयी वाणी एक ऐसे दिल को प्रकट करती है जिसमें सिर्फ़ कड़वाहट और नफ़रत भरी होती है। कोमल और अनुग्रहपूर्ण शब्द एक मंगलमय और प्यार भरे दिल को प्रकट करते हैं। मुंह के शब्द या तो विनाशकारी हो सकते है, या फिर लाभदायक। यहां अन्य कोई विकल्प नहीं हैं। आपके मुंह के शब्द ही आपकी पहचान कराते हैं।
ख्रिश्चन लोगों के वचन हमेशा अनुग्रह सहित और सलोने होने चाहिए, जिनमें अनुग्रह सहित सुधार और बुद्धि के सुझाव हो (कुलुस्सियों 4: 6)। परमेश्वर को भाने के लिए हम ऐसे ही अनुग्रह सहित और सलोने वचन बोलते हैं। इस संतुलन के बाहर कटु आलोचना, कठोर शब्द और ताने मारना यह सब बिलकुल गलत हैं (इफि 4:31-32)। आपको दूसरों से उसी स्वर और प्रकार से बातें करनी चाहिए, जैसे आप चाहते हैं कि परमेश्वर आपसे करे।
आपकी बात दूसरों के लिए जीवन-वृक्ष हो (नीतिवचन 15:4), और उसकी मिठास और चंगाई (नीतिवचन 16:24) और सुंदरता (नीतिवचन 25:11) के लिए इसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। यदि आपके कुछ ही ऐसे गिने-चुने दोस्त और गिने-चुने परिवार के सदस्य हैं जो आपके साथ बातें करने के लिए आपसे मिलते हैं, तो आपको अपने शब्दों का परिक्षण करने की आवश्यकता है। इस नीतिवचन का नियम झूठ नहीं है। यदि आपके करीबी मित्र बहुत ही कम हैं, तो इसका अर्थ यह है कि आपकी जीभ अवश्य ही आक्रामक और आहत करनेवाली है।
पीठ पीछे किसी की बुराई करना, चुगली करना, कानाफूसी करना और कहानियाँ फैलाना, जो गहरे घाव कर जाते हैं, कभी भी आप की बातचीत का हिस्सा नहीं होना चाहिए, क्योंकि इनसे एक विश्वासघाती आत्मा प्रमाणित होती हैं (नीतिवचन 18: 8; 26:22)। यदि आप किसी व्यक्ति के सामने दूसरों की बुराई करते हैं, तो वह व्यक्ति उचित ही यह मान लेता है कि आप अवश्य ही उसकी भी दूसरों के सामने बुराई करते होंगे। और चूँकि कोई भी मनुष्य कानाफूसी का विषय नहीं बनना चाहता, इसलिए वह आपकी संगति से और आप से अपनी निज़ी ज़िन्दगी की बातें करने से बचेगा। हमेशा दूसरों के बारे में अच्छी, अनुग्रह सहित और शुक्रगुज़ार बातें कहना शुरू करें, और जल्द ही आप ऐसे लोग को पाएंगे जो आपके मित्र बनना चाहेंगे।
यीशु ने कहा कि कठोर वचन कहना हत्या का अपराध है (मत्ती 5:21-22)। बिना किसी पवित्र उद्देश्य और वैध कारण के क्रोध करना और अपमानजनक भाषा बोलना छठी आज्ञा का उल्लंघन है। मूर्खतापूर्ण और अशिक्षित प्रश्न, वाद-विवाद, निंदा करना, आलोचना करना और उल्टा उत्तर देना, ये सभी पाप हैं (2 तीमु 2:23; रोमियों 1:29; 1 पतरस 3:9; तीतुस 2:9)। स्वर्ग का पवित्र परमेश्वर मनुष्यों से अपेक्षा करता है कि वे हमेशा नियोक्ताओं से सम्मानपूर्वक और अपनी पत्नियों से सम्मानपूर्वक बात करें (1 तीमु 6:1-2; 1 पतरस 3:7)।
अवसर पर कहा हुआ वचन क्या ही भला होता है (नीतिवचन 15:23), जो अनुग्रह सहित और स्वीकार्य होता है (नीतिवचन 10:32; 15:1; 25:11)। ऐसा वचन हर्षित कर देता है जिससे लोग बोलनेवाले के होठ चूमना चाहते हैं, और राजा भी उसे अपना करीबी दोस्त बनाना चाहते हैं (नीतिवचन 24:26; 16:13; 22:11)। सोच–विचार से बोलें (याकूब 1:19), अच्छे शब्दों का चयन करें (नीतिवचन 15:28), और उन्हें सावधानी से कहें (नीतिवचन 17:27-28)। सुनने में तत्पर और बोलने में धीमे बनें ताकि आप जोखिम को कम कर सकें, और जिससे कि आप कम बात करें (नीतिवचन 10:19)।
प्रभु यीशु मसीह अपनी ज्ञानी जीभ से अपने समय के फरीसियों और अन्य मूर्खों को धूल में मिला देने में सक्षम था (मत्ती 7:28-29; 21:27; 22:46), और कभी-कभी वह उचित ही उनका मुंह बंद करता था ताकि जो भोले और नासमझ थें उन्हें ज्ञान की बातें सिखाए (नीतिवचन 21:11; 26:5)। लेकिन उसके वचन अकसर अनुग्रह सहित होते थें जिससे सुननेवाले अचम्भित हो जाते थें (भजन 45:2; लूका 4:22; तीतुस 2:8)। यदि आप बुद्धिमान बनना चाहते हैं, तो WWJD ब्रेसलेट पहनने के बजाय, आज से ही अपनी ज़िन्दगी के बाकी दिनों में वैसी ही बातें करें जैसी हमारा प्रभु यीशु मसीह करता था।
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