नीतिवचन 12:16

मुर्ख का क्रोध तुरंत जाना जाता है, परंतु चतुर लाज को ढ़ांपता है।

आपको शर्म आनी चाहिए! आप किस बात पर नाराज़ हैं? तुम उदास क्यों हैं? आपके साथ क्या बुरा हुआ है? आप इतने बिगड़े हुएं क्यों हैं? परमेश्वर की भलाई तो सदा के लिए बनी रहती है (भजन 52:1)! जिन बातों के लिए आप पागल हैं, उससे दस गुना अधिक तो आपके पास आनन्द मनाने और परमेश्वर को धन्यवाद देने के लिए कारण हैं!

शीघ्र कोप मूर्ख की पहचान है, क्योंकि समझदार लोग अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखकर क्रोध की लाज से बचते हैं। सुनने के लिये तत्पर रहें, दूसरों को क्षमा करें और पवित्रजनों की सेवा करें; और बोलने में धीर और क्रोध में धीमें रहें (याकूब 1:19)। छोटी छोटी बातों पर चिल्लाना या बिना किसी बात के रोना-धोना नादान बच्चों, बिगडैल युवाओं, और अशिक्षित बच्चों को शोभा देता है; बेक़ाबू होकर खुद को दूसरों के सामने बचकाना साबित न करें।

क्रोध करना उग्रता या हिंसात्मक गुस्सा होता है; यह आगबबूला होकर झुंझलाना या नाराज़ होना है; यह गहरा आक्रोश है। बुद्धिमान लोग, जो बाइबल की शिक्षा पर चलते हैं, दूसरों के विरुद्ध ऐसी भावनाओं से बचने के लिए अपनी आत्माओं पर शासन करते हैं, जब तक कि क्रोधित होने का कारण नेक और उचित न हो (नीतिवचन 14:17,29)। “जो क्रोध करने में धीमा है, वह सामर्थी से उत्तम है; और जो अपने मन को वश में रखता है, वह नगर को जीतनेवाले से उत्तम है” (नीतिवचन 16:32)।

क्रोध और प्रकोप दोनों ही विध्वंसक आवेग हैं, और इनसे लोग ऐसी बातें कहने और करने पर आमादा हो जाते हैं जिन्हें वे सामान्य होने पर नहीं करते। इसलिए, उन पर क़ाबू किया जाना आवश्यक है, और सख्ती से क़ाबू किया जाना चाहिए। मूसा ने क्रोध में आकर चट्टान को आज्ञा देने के बजाय उस पर प्रहार किया, और परमेश्वर ने उसे कनान में प्रवेश करने से वंचित कर दिया (गिनती 20:7-13)। क्रोध के कारण ही शाऊल अपने ही विश्वासयोग्य पुत्र योनातान को मारना चाहता था (1 शमू 20:30-34)।

सब प्रकार का क्रोध ग़लत नहीं होते, क्योंकि यीशु ने केवल ऐसे के लिए दोषी ठहराया जो “अकारण” है (मत्ती 5:21-22)। निःसंदेह, आज के आधुनिक बाइबल संस्करणों में, जो ईसाई धर्म के अपने समकालीन, स्त्रैण रूप का अनुसरण करते हैं, सब प्रकार के क्रोध को ग़लत ठहराने के लिए इन शब्दों को हटा दिया गया है। ऐसा करके उन्होंने परमेश्वर, यीशु मसीह, और पवित्र नबियों, प्रेरितों और संतों को पापी कहकर दोषी ठहराया है!

पौलुस इस महत्वपूर्ण मुद्दे को और स्पष्ट करता है, जब वह समझाता है, “क्रोध तो करो, पर पाप मत करो; सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे” (इफि 4:26)। जब क्रोध आता है, तो आप उसे पाप का कारण नहीं बनने दे सकते; और आप क्रोध को न तो तेज़ी से बढ़ने देते हैं और न उसे कड़वाहट में बदलने देते हैं। जब कोई मसला क्रोध को उकसानेवाला बनने लगता है तो आप उसे न्यायसंगत तरीके से निपटते हैं और जल्द से जल्द उस मसले का समाधान निकालते हैं।

मूर्ख बिना किसी उचित कारण के जल्दी क्रोधित हो जाते हैं, और वे अपने क्रोध को उबलने भी देते हैं। उनका क्रोध तुरंत जाना जाता है – वह उनके चेहरे पर तुरंत दिखाई देता है और उनकी बातों से स्पष्ट हो जाता है। वे अपनी भावनाओं पर काबू न रखकर साबित करते हैं कि वे मूर्ख हैं। बुद्धिमान लोग अपनी भावनाओं पर संयम रखते हैं और किसी भी मसले पर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते। मूर्ख बिना सोचे-समझे तुरंत तगड़ी प्रतिक्रिया अभिव्यक्त कर बैठते हैं; बुद्धिमान प्रतिक्रिया देने से पहले सोचते हैं। जहाँ मूर्ख अपने क्रोध के वश में होते हैं, वही बुद्धिमान लोग क्रोध को अपने वश में रखते हैं।

इस नीतिवचन का महत्वपूर्ण सबक यह है : एक समझदार व्यक्ति बोलने से पहले सोचेगा और जल्दबाजी में क्रोध करने के कारण होने वाली मूर्खता की लज्जा से बचेगा (सभो 7:9)। नीतिवचन की पुस्तक का उद्देश्य यही है कि आपको जीवन में सफल बनाने के लिए ज्ञान सिखाना – और यदि आप अपने आवेग, विशेष रूप से क्रोध, प्रकोप और ईर्ष्या को अपने क़ाबू में रखना नहीं सीखते हैं तो आप जीवन में कभी सफल नहीं हो पाएंगे (नीतिवचन 27:4)।

जो पुरुष अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हैं और जो पुरुष अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं, उनके बीच का अंतर बहुत बड़ा है। सुलैमान ने आत्म-नियंत्रित व्यक्ति को एक पराक्रमी वीर और सैन्य-विजेता के रूप में प्रतिष्ठित करके उस अंतर की प्रतिष्ठा कीं (नीतिवचन 16:32)। उसने यह भी चेतावनी दी कि क्रोध करनेवाले लोग किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करने में कमज़ोर पड़ जाते हैं और अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं में आसानी से असफ़ल हो जाते हैं (नीतिवचन 25:28)।

एक और सबक, हालांकि यहां सीधे तौर पर नहीं सिखाया गया है, वह यह है कि बुद्धिमान व्यक्ति शीघ्र-कोपी लोगों से दूर रहता है, कहीं ऐसा न हो कि उसका प्राण फन्दे में फँस जाए (नीतिवचन 22:24-25)। यदि आप उन लोगों के साथ संगति करते हैं जो अपनी भावनाओं और स्वभाव को क़ाबू में नहीं रखते, तो आप भी उनकी विकृत आदतों को सीखकर अपना लेंगे (नीतिवचन 13:20; 1 कुरिन्थ 15:33)। जो आत्म-नियंत्रण और आत्म-संयम आपमें कभी हुआ करता था, उसे आप खो देंगे, और आपका जीवन असफलता की ओर बढ़ने लगेगा।

ख्रिश्चन पाठक, अपनी भावना पर क़ाबू रखें; उसे आप पर हावी न होने दें, “क्योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर के धर्म का निर्वाह नहीं कर सकता” (याकूब 1:20)। यदि आप क्रोध को अपने हृदय से फूटने देते हैं और खुद को ही लज्जित होने देते हैं, तो आप के लिए परमेश्वर की संतान होना असंभव है। क्रोध और झगड़े में कोई महिमा नहीं है, चाहे आपका शरीर, दुनिया या शैतान आपसे कितना भी झूठ बोले (याकूब 3:14-16)।

विश्व स्तरीय खिलाड़ी चैंपियन बनने की अपनी मेहनती महत्वाकांक्षाओं में अपनी सभी इच्छाओं और आवेग को अनुशासित और संयमित रखते हैं (1 कुरिन्थ 9:24-25)। इसे संयम कहते हैं। वे जानते हैं कि सर्वश्रेष्ठ बनने के लिए खाने, सोने, प्रशिक्षण में बदलाव करने या एक दिन की छुट्टी लेने के आवेगों को नकारना आवश्यक है। यदि आप यीशु मसीह का अविनाशी मुकुट जीतना चाहते हैं, तो आपको स्वयं का भी इन्कार करना होगा (1 कुरिन्थ 9:26-27)।

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