नीतिवचन 12:15
मूढ़ को अपनी चाल अपनी दृष्टि में सीधी जान पड़ती है, परन्तु जो सम्मति मानता, वह बुद्धिमान है।
हर मूर्ख सोचता है कि वह सही है। वह इसके आलावा कुछ और सोच ही नहीं सकता। उसे लगता है कि बाकी सब लोग गलत हैं। जो मनुष्य बुद्धिमान होता है वह अपने विचारों से मन फिराना सीखता है। वह समझ जाता है कि उसके विचार स्वार्थी, पक्षपाती और धोखेबाज हैं। अब वह दूसरों की सम्मति को ध्यान से और विनम्र भाव से सुनता है और मानता है, क्योंकि वह जानता है कि उनकी सम्मति इतनी स्वार्थी, पक्षपाती और धोखा देनेवाली नहीं हैं जितना कि उसके मन की बात सुनना।
मनुष्य अंदर से बाहर तक भ्रष्ट है। उसका हृदय – जो प्रेम, उद्देश्यों और फैसले लेने का आंतरिक स्थान है- बाकी सब चीजों से बढ़कर कपटी और भ्रष्ट है। बाइबल घोषणा करती है कि “मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?” (यिर्मयाह 17:9)। कौन है जो अपने मन की विकृत प्रकृति को सच में जान सकता है? आप तो बिलकुल ही नहीं, जब तक आप बाइबल पर विश्वास नहीं करते।
स्वभावतः, आप परमेश्वर, बुद्धि, सुधार और जो आपको सुधारते हैं, उनसे घृणा करते हो। स्वभाव से आप अपने आप से प्यार करते हैं, अपने आप को सही मानते हैं, और आप विश्वास कर चुकें हैं कि आप हर काम को दूसरों से बेहतर करते हैं। आपके हिसाब से आपके असफल होने का एकमात्र कारण किसी और की गलती या बुरी परिस्थितियाँ हैं। और इसी विश्वास में बने रहने के लिए आपके पास हर आधार मौजूद है, और वह यह कि आप हमेशा सही थे, हैं, और रहेंगे। वाह, क्या मूर्खता है!
मानव-घमण्ड और विद्रोह के इस दलदल से बाहर निकलने के लिए, आपको अपने विचारों पर सन्देह करना, उनको आलोचनात्मक दृष्टि से देखना और उनसे अपना मन फिराना सीखना होगा। यह प्रक्रिया बुद्धि और ज्ञान की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक है, क्योंकि आप अपने विचारों की रक्षा पूरी शिद्दत, शक्तिशाली प्रवृत्ति और वासनाओं के साथ करना चाहते हैं और उन्हीं के पीछे भागना चाहते हैं। अपनी गलती मान लेना और दूसरे की सम्मति स्वीकार करना विनम्रता का सर्वोत्तम अभ्यास है।
बुद्धि का सबसे श्रेष्ठ माप इस बात से होता है कि आप में अपने विचारों को कुचलने और दूसरों से मार्गदर्शन पाने की कितनी शक्ति है। नीतिवचन की पूरी किताब में सुलैमान द्वारा कही गई यह सबसे आम बात है। वह लगातार अपने श्रोताओं से शिक्षा और निर्देश प्राप्त करने की सलाह देता है, क्योंकि वह जानता था कि उनके दिल स्वभाव से ही ऐसी किसी भी सम्मति या विचार के खिलाफ विद्रोह करते हैं अगर वह उनकी अपनी विचारधाराओं और कल्पनाओं के विपरीत है।
प्रत्येक मनुष्य को पूर्ण विश्वास और समर्पण के साथ परमेश्वर और धर्मग्रंथ के पास आना ज़रूरी है। प्रत्येक उपदेश के लिए एक पवित्र सम्मान स्थापित किया जाना ज़रूरी है; प्रत्येक विपरीत विचार के लिए पवित्र घृणा पैदा की जानी ज़रूरी है (भजन 119:128)। सुलैमान ने लिखा, “तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना” (नीतिवचन 3:5)। “अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न होना” (नीतिवचन 3:7)।
अवश्य है कि आप अपने शोर करनेवाले मन को चुप कराएं। बुद्धि की लालसा करें और स्वीकार करें कि यह स्वभाव से ही आपमें नहीं है। स्वीकार करें कि हाँ, सच्ची बुद्धि वास्तव में केवल परमेश्वर के पास ही है। सब बातें पवित्रशास्त्र से प्रमाणित करें (1 थिस्स 5:21; प्रेरितों 17:11)। व्यावहारिक निर्णयों के लिए अनेक बुद्धिमान सम्मतिकारों से सम्पर्क करें (नीतिवचन 11:14; 15:22; 24:6)। पूरी शिद्दत और परिश्रम से अपने मन की रक्षा करें (नीतिवचन 4:23; यशायाह 8:20)।
दैनिक चुनाव की प्रक्रिया आपके मन को सक्रिय कर देती है। मूर्ख अपने मन की सुनते हैं; बुद्धिमान लोग परमेश्वर के वचन से परामर्श लेते हैं। मूर्ख दूसरों की शिक्षा और चेतावनियों को दुत्कारते हैं; बुद्धिमान लोग दूसरों की शिक्षा और चेतावनियों से प्रेम करते हैं और उन्हें खोजते हैं। यह सोचकर तसल्ली न पाएं कि आप सही हैं; सुनिश्चित करें कि आप इन दोनों मानदंडों पर खरे उतरते हैं।
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