नीतिवचन 12:13

बुरा मनुष्य अपने दुर्वचनों के कारण फन्दे में फँसता है, परन्तु धर्मी संकट से निकास पाता है।

आपका मुँह आपको बहुत-सी मुसीबतों में डाल सकता है, या वह आपको मुसीबतों से बाहर भी निकाल सकता है। मूर्ख व्यक्ति बोलने से पहले शायद ही कभी सोचता है, और अगर बोलने से पहले सोचता भी है तो उसकी वह सोच उसके बुरे या घिनौने मन से निकलती है, इसलिए वह अपने दुर्वचनों के कारण मुसीबतों के फन्दे में फँसता है और दण्ड भुगतता है (नीतिवचन 18:6-7)। लेकिन वही धर्मी व्यक्ति, जो बुद्धि के नियमों पर चलकर मीठी वाणी में बोलता है, खुद को परमेश्वर और मनुष्य के क्रोध से बचाता है।

आपने कितनी बार खुद से कहा है, “मैंने ऐसा क्यों कहा?” विवेक और बुद्धि की सुंदरता और शक्ति यह है कि आप अपने शब्दों को बोलने से पहले उन पर विचार करते हैं, ताकि आपको उन पर पछतावा न हो। सुलैमान ने कई नीतिवचनों के उपयोग से दिखाया कि जो बातें बुद्धिमानी से कही जाती है वे मन से निकलती हैं (नीतिवचन 16:23; 22:11), उसके शब्द कम होते हैं (नीतिवचन 17:27-28), आपके भावावेग को काबू में रखती है (नीतिवचन 14:29; 16:32), संयम से बोलती है (नीतिवचन 29:11,20), और सावधानी तथा सोच-समझकर होती है (नीतिवचन 10:31-32; 15:28)।

कुछ उदाहरणों विचार करें, जैसे किसी परिचित के लिए बैंक-कर्ज़ में उसका गारंटर बनना। दूसरों के कर्ज़ की गारंटी देने के लिए जल्दबाजी में अग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने के फैसलें खतरनाक होते हैं (नीतिवचन 22:26-27)। ऐसी जिम्मेदारियों को बहुत सावधानी से टाला जाना चाहिए, और अगर आप ऐसा कर चुके हैं तो आपको ऐसे अग्रीमेंट से बाहर निकलने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए (नीतिवचन 6:1-5)। ऐसे फंदे की शुरुआत कैसे होती है? सबसे पहले आपको भावना का शिकार बनाकर आपको कर्ज़ के अग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने का अनुरोध किया जाता है, और आपकी जुबान मूर्खतापूर्ण रूप से प्रतिबद्धता के शब्द बोल बैठती है।

शपथ लेने पर विचार करें। परमेश्वर मूर्खतापूर्ण रूप से ली गई शपथो के विरुद्ध चेतावनी देता है और उनकी निंदा करता है (सभोपदेशक 5:1-7)। बुरे लोग बिना किसी सावधानी के चर्च या प्रार्थना में कुछ भी कहने में जल्दबाजी करते हैं, इस प्रकार वे अपनी आत्मा को परमेश्वर के सामने बांध लेते हैं। वे यह सोचने में बहुत बड़ी गलती करते हैं कि मुँह के शब्द कोई बड़ी समस्या नहीं हैं और वे आसानी से शपथ से बाहर निकल सकते हैं (नीतिवचन 20:25)। बुद्धिमान लोग परमेश्वर के सामने डर-डरकर और कांपते हुए बोलते हैं।

झगड़े पर विचार करें। दुष्ट व्यक्ति जो अपने शत्रु के क्रोध का सामना कर रहा होता है उसके लिए यह ज़रूरी है कि वह मीठी वाणी और संयमित शब्दों का उपयोग करे, क्योंकि उसका मन घमंड से भरा और जिद्दी होता है। वह यह सबक नहीं सीख पाता और न ही सीखेगा कि मीठे शब्दों में जवाब देने से क्रोध शांत हो सकता है, जबकि कड़वे शब्द उसे और भी भड़काते हैं (नीतिवचन 15:1; 17:14)। वह विवाद जीतने की कोशिश करेगा, क्योंकि उसका शांति के लिए न तो कोई वास्तविक इरादा होता है और न ही इच्छा (नीतिवचन 11:12)।

किसी को व्यक्तिगत रूप से शाप देने पर विचार करें। मूर्ख में कोई विवेक नहीं होता। उसके दिल को अपने सबसे बुरे विचार व्यक्त करने ही होते हैं। वह अपने घर में बैठे बैठे अपनी सरकार या अमीरों को कोसता है, और वह समझ नहीं पाता कि उसके ये शब्द उस व्यक्ति तक आखिर कैसे पहुँचते हैं जिसको उसने कोसा होता है (सभोपदेशक 10:20)। परतु बुद्धिमान व्यक्ति अच्छी बातें सोचना सीखता है और किसी भी परिस्थिति में अपने मुँह से बुरे शब्द नहीं निकलने देता (नीतिवचन 16:23; मत्ती 5:21-22)।

पौलुस ने तीन प्रकार की वाणियों के विषय में आगाह किया जो आज आम और बड़ी लोकप्रिय हैं – निर्लज्जपूर्ण गन्दी बातें, मूढ़ता की बातचीत, और दूसरों की ठट्ठा करते हुए हँसी-मज़ाक उड़ाना (इफिसियों 5:3-8)। लेकिन ऐसी बातें अशोभनीय हैं, मतलब यह अनुचित हैं और मुसीबतों का कारण बनती हैं। इसका इलाज क्या है? ऐसी बातों बोलने के बजाए परमेश्वर और मनुष्यों को धन्यवाद देना शुरू करें। इससे आपके जीवन में कितना फर्क पड़ेगा!

आपकी सफलता या असफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप आपकी जीभ पर काबू रखने में कितने सक्षम हैं। अगर आप अपनी वाणी को नियंत्रित नहीं रकते और और उसे सम्भालना नहीं सीखते हैं, तो आप खुद को बहुत दुःख और परेशानी में डाल लेंगे। शुद्ध विचार सोचें, अपने शब्दों को कम रखें, अपनी वाणी को संयमित रखें और परिणामों को ध्यान में रखते हुए बहुत सावधानी से बोलना बहुत बेहतर है (याकूब 3:2)। एक बुद्धिमान व्यक्ति केवल विचार-विमर्श और जाँच के बाद भक्तिपूर्ण शब्दों में बोलने के लिए लगन से काम करता है (भजन 19:14; 141:1-4)।

न्याय के दिन आपके द्वारा बोले गए हर व्यर्थ वचन का हिसाब लिया जाएगा (मत्ती 12:36-37), इसलिए पौलुस ने लिखा कि आपकी बातचीत अनुग्रहपूर्ण हो (कुलुस्सियों 4:6; इफिसियों 4:29)। ऐसा करना आपको मुसीबत से बचाएगा और दूसरों से प्रशंसा और पदोन्नति दिलाएगा (नीतिवचन 22:11; 24:26)। ऐसे सरल रास्ते पर चलने से आप परमेश्वर और मनुष्यों दोनों के अनुग्रह में बढ़ेंगे (नीतिवचन 17:27-28)।

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