नीतिवचन 11:31

देख, धर्मी को पृथ्वी पर फल मिलेगा, तो निश्चय है कि दुष्ट और पापी को भी मिलेगा।

आपका अनन्तकालीन पुरस्कार या दंड – अर्थात् स्वर्ग या नरक – किसी भी सांसारिक पुरस्कार या दंड से कहीं अधिक बढ़कर होगा। लेकिन परमेश्वर इस जीवन में भी धर्मी और दुष्टों को प्रतिफल देता है। ऐसे में, धर्मी को निराश नहीं होना चाहिए कि उन्हें इस जीवन में आज ही कोई प्रतिफल नहीं दिया जा रहा है, और दुष्ट भी यह न सोचे कि उसे तुरन्त दंड नहीं दिया जा रहा इसलिए वह अपने अधर्म के फल से बच गया है (भजन 27:13; 1 पतरस 4:17-18)।

जब सुलैमान कहता है, “देख”, तो वह चाहता है कि आप उसकी बात की ओर ध्यान दें। परमेश्वर मनुष्यों के साथ के कैसा व्यवहार करता है उस पर आपको गंभीरता से विचार करना चाहिए। वह पृथ्वी पर मनुष्यों को उनके हर एक कर्म का प्रतिफल देगा। आप उसकी आँखों से छिपे नहीं हो; आप भीड़ में उसकी दृष्टि से ओझल नहीं हो सकते। धर्मी को आशीर्वाद मिलेगा; दुष्टों को दण्ड मिलेगा। स्वर्ग में एक परमेश्वर है; वह सत्कर्म से प्रेम रखता है और दुष्कर्म से घृणा रखता है; मनुष्य जो बोता है वही काटेगा।

धर्मी और दुष्ट दोनों ही पृथ्वी पर विपत्तियों से गुज़रते हैं – ताकि जो लोग आत्मिक नहीं हैं वे परमेश्वर के प्रेम या घृणा को न समझ सकें (सभोपदेशक 8:14; 9:1-3)। हालाँकि, बाइबल बहुत बड़े अंतरों को प्रकट करती है, जिसे सांसारिक मनुष्य नहीं सीख सकते। परमेश्वर धर्मी और दुष्टों के साथ बिलकुल भिन्न तरीके से व्यवहार करता है। आत्मिक लोग यह जानते हैं : वे समझते हैं कि वह वर्तमान में कैसा प्रतिफल देता है और भविष्य में क्या प्रतिफल देगा।

परमेश्वर अपने प्रेम के कारण ही धर्मी लोगों को अनुशासन में रखने और उन्हें पूर्ण करने के लिए उनपर विपत्ति भेजता है (नीतिवचन 3:11-12; भजन 11:5; आमोस 3:2; 1 कुरिं 11:32; इब्रानियों 12:5-17)। उनके प्रति उसके विचार केवल अच्छे हैं; वह उनकी प्रार्थनाएँ सुनता है और उनकी अभिलाषाएं पूरी करता है (भजन 34:10-16; 37:4; 84:11)। वह उन्हें धन, या धन से भी उत्तम चीज़ों, या दोनों ही देकर आशीष देता है (नीतिवचन 15:16-17; 21:21; 22:4; 1 तीमुथियुस 6:6)।

परमेश्वर दुष्टों से बैर रखता है, और अपने इस बैर में ही वह उनके जीवनों में समृद्धि को भेजता है (नीतिवचन 1:32; भजन 17:14; 73:1-20)। और वह आने वाले बड़े न्याय की चेतावनी के रूप में उनपर विपत्ति को भेजता है। उनके प्रति उसके विचार विपत्ति के ही हैं; वह उनकी प्रार्थनाएँ नहीं सुनता; वह उनकी विपत्तियों पर हँसता है (नीतिवचन 15:8; 28:9; 1:20-31)। उनकी मूर्खतापूर्ण सुख-विलासिता उन्हें न्याय के दिन दोषी ठहराएँगी (प्रेरितों 14:15-17; रोमियों 1:18-32)।

सही करना या गलत करना एक फैसला है। सत्य और धर्मपरायण जीवन जीने के परिणाम या प्रतिफल पाप के जीवन से उत्तम हैं। बुद्धि इन्सान को आत्म-सुख और संतुष्टि और लंबी आयु के साथ साथ बाहरी समृद्धि की ओर भी ले जाती है (नीतिवचन 3:13-26; 10:22; 13:15; भजन 37:4; 84:11)। पाप दुःख, अपराध, विपत्ति और मृत्यु की ओर ले जाता है (नीतिवचन 3:33-35; 4:19; 5:7-14; 11:8; 13:15; 15:16; 24:20)। सबक स्पष्ट है।

यह नीतिवचन और उसकी व्याख्या सत्य है (नीतिवचन 11:20; भजन 58:10-11)। क्या आप इस पर विश्वास करेंगे और उसके अनुसार जीवन व्यतीत करेंगे? धर्मी पाठक, धीरज धरें! पापी, सावधान रह! निम्नलिखित शास्त्र-वचन पढ़ें:

“परमेश्वर अपने पवित्र भवन में है; परमेश्वर का सिंहासन स्वर्ग में है; उसकी आँखें मनुष्य की सन्तान को नित देखती रहती हैं और उसकी पलकें उनको जाँचती हैं। यहोवा परमेश्व धर्मी को परखता है, परन्तु वह उनसे जो दुष्ट हैं और उपद्रव से प्रीति रखते हैं अपनी आत्मा में घृणा करता है। वह दुष्टों पर फन्दे बरसाएगा; आग और गन्धक और प्रचण्ड लूह उनके कटोरों में बाँट दी जाएँगी।” (भजन 11:4-7)।

जीवन कठिन है (अय्यूब 5:6-7), परन्तु बाद में स्वर्ग में अनंत काल श्रेष्ठ है (यशायाह 57:1-2)। परमेश्वर धर्मी लोगों से अब और आनेवाले अनन्तकाल में भी प्रेम रखता है; वह दुष्टों से अब और आनेवाले अनन्तकाल में बैर रखता है। यद्यपि परमेश्वर वर्तमान में धर्मी लोगों से प्रेम करता है और उन्हें आशीर्वाद देता है, फिर भी अनंत काल अपनी श्रेष्ठ गुणवत्ता और कभ न ख़त्म होनेवाले समय के लिहाज से जीवन का सर्वोत्तम दृष्टिकोण है (भजन 49:1-20; 73:1-28; 1 कुरिन्थियों 15:19; 2 कुरिन्थियों 4:17-18; फिलिप्पियों 3:18-21; कुलुस्सियों 3:1-4)।

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