नीतिवचन 11:29
जो अपने घराने को सताता है सो पवन का उत्तराधिकारी होगा, और मूर्खजन बुद्धिमान अंतःकरण का सेवक होगा। (केजेवी)
यहां दो मार्ग हैं जिन पर चलकर आप अपने लिए मुसीबत में खड़ी कर के उसकी भारी कीमत चुका सकते हैं। आप अपने परिवार में मिली अपनी सुविधाओं का दुरुपयोग कर सकते हैं, या परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों की उपेक्षा कर सकते हैं, और अंत में आपको कुछ भी हासिल नहीं होगा। सम्भावित समृद्धि यूं चुटकियों में लोप हो जाएगी। ये और अन्य मूर्खतापूर्ण चुनाव आपको ज़मीन पर लाकर गिरा देंगे : अंत में आप उनकी सेवा करेंगे जो अपने लिए चुनाव करने समय बुद्धि और चतुराई से काम करते हैं।
पिता कई तरीकों से अपने ही घराने को सता सकते हैं। लालच स्पष्ट रूप से उनमें से एक है (नीति 15:27)। वे कई घंटे काम करते हैं, व्यर्थ के उद्यम में पैसा बर्बाद करते हैं, और अपने परिवार को अपनी व्यक्तिगत देखभाल से वंचित रखते हैं, पैसों के व्यवहार में कंजूस होते हैं, बेईमानी करते हैं, और सम्पत्ति को प्राप्त करने की अपनी धुन में वे सांसारिक मन के बन जाते हैं। मूर्ख और आलसी मनुष्य अपने आलसीपन और उपेक्षा के द्वारा अपने ही परिवार के लोगों को उनकी ज़रूरतों और अवसरों से वंचित रखकर उन्हें चोंट भी पहुंचा सकते हैं।
पिता अत्यंत मनमानी करनेवाले, दिल के सख्त, कमियां निकालने वाले, और दबंग भी हो सकते हैं, जो उनकी पत्नियों और बच्चों को निराश कर सकता है, या उनके क्रोध को उकसा सकता है (इफि 6:4; कुलु 3:21)। दूसरी ओर, एक पिता अपने परिवार के लिए निर्णय लेने की अपनी भूमिका को टालने, या घर का मुखिया न बनकर भी अपने परिवार को मुसीबत में डाल सकता है। ऐसे में, पत्नी और बच्चें बीच समंदर में एक ऐसे जहाज़ में होते हैं जिसका कोई कप्तान नहीं। उनके जीवन में कोई सुरक्षा और मार्गदर्शन नहीं होता है।
यद्यपि यहां पिताओं को सम्बोधित किया जा रहा है, फिर भी हर कोई जानता है की मनमानी करनेवाली पत्नियां और माताएं भी बुरी ही होती हैं (नीति 12:4; 19:13; 21:9, 19; 25:24; 27:15-16; 30:21-23)। वे बच्चों में क्रोध, कड़वाहट, निराशा, मानसिक तनाव, और यहां तक कि द्वेष-भावना को उत्पन्न करती हैं, हालांकि वे अपने इस घिनौने आचरण की यह कहकर लीपापोती करती हैं कि “मैं तो केवल मदद करना चाह रही थी।” वे हमेशा हस्तक्षेप करती हैं, चिढ़ानेवाली टिप्पणियां करती हैं, बच्चों में कमियां ढूंढती हैं, और जीवन की जरा जरा-सी बातों के विषय में अपने सुझाव को स्वीकार कराने के लिए दबाव डालती हैं।
इन स्वार्थी पुरुषों और स्त्रियों, अर्थात् मूर्ख पिताओं और माताओं के लिए क्या सज़ा है? वे अपने घरानों को खो देते हैं। उनके बच्चें उन से छुटकारा पाने के लिए बड़ी मुश्किल से अपने विवाह तक इंतज़ार कर पाते हैं। कुछ तो विवाह से पहले ही किसी नौकरी या पढ़ाई का बहाना बनाकर उनसे दूर चले जाते हैं। ऐसे बच्चें केवल दबाव बनाने पर ही घर आते हैं। वे अपने स्वार्थी और आलोचना करनेवाले माता-पिता के साथ रहने की झंझट से छुटकारा पाने के लिए घर से बाहर ही बहुत कुछ करना चाहते हैं। वे मन की शांति और शोरगुल से मुक्त स्थान ढूंढते हैं, जहां वे अपनापन पाए, और सुख से रह सके, जहां प्रेम ही सब कुछ है; वे बस अपने क्रूर माता-पिता से दूर होना चाहते हैं और उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं।
ऐसे मूर्खजन जीवन की जंग को भी हार जाते हैं। जहां सौम्यता होती है, वहां विवेकपूर्ण और बुद्धिमान मनुष्य बनते हैं; जहां निकम्मापन होता है, वहां मूर्ख और मनमौजी मनुष्य बनते हैं। जिंदगी से हारे ये लोग अंत में उनकी सेवा करते हैं जो बुद्धिमान अंतःकरण के हैं। उन्हें उनकी कामयाबी से जलन होती है; वे उनके टुकड़ों पर पलने उन से दया की गुहार लगाते हैं, वे उनसे धन उधार लेते हैं; सम्भवतः वे उनके लिए काम करते हैं। परंतु बुद्धिमान मनुष्य जीवन की बाजी को जीतते हैं, और मूर्ख उन से पराजित हो जाते हैं। इसलिए आज ही बुद्धि को अपनाओ।
अपने ही घराने को सताने के नतीजे सामने आते ही हैं। मूर्ख पिता और माता, जो अपने स्वार्थीपन में बच्चों की उपेक्षा करते, या कुटिलता से उनके जीवन में हस्तक्षेप करते हैं वे अपने बच्चों को खो देंगे। वे अकेले ही मर जाएंगे – भले ही उनके बच्चें अपने कर्तव्य से विवश हो कर उनसे मिलने-जुलने आते रहते हैं। मूर्खतापूर्ण चुनाव से मनुष्य अपनी ही शोहरत खो बैठता है; बुद्धिमान मनुष्य उसका धनी बन जाता है। ये दण्ड स्वाभाविक और उचित हैं।
यह नीतिवचन ऐसे बच्चों पर भी लागू होता है जो अपने पिता और माता का आदर नहीं करते। उनका उत्तराधिकार भी केवल पवन ही होगा। वे उन सब लाभों को जो उनके हो सकते थे या होने चाहिए थे, प्राकृतिक विपत्तियों और ईश्वरीय दण्ड के द्वारा खो देंगे। वे अंत में अपने भाइयों की या उन अन्य मनुष्यों की सेवा करेंगे जो बुद्धिमान अंतःकरण के हैं। धार्मिकता और बुद्धि के महान लाभ के विषय में बताना ही नीतिवचन की पुस्तक का स्थाई और निरंतर सबक है।
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