नीतिवचन 11:23

धर्मियों की लालसा तो केवल भलाई की होती है; परन्तु दुष्टों की आशा का फल क्रोध ही होता है।

आपका भविष्य क्या है? सब बातों के अंत में आपको और आपके परिवार को क्या प्रतिफल मिलेगा? क्या आप आने वाले दिनों की एक झलक देखना चाहते हैं? यह नीतिवचन सच है। यह जो कहता है उस पर विश्वास करो। यकीन मानो कि ऐसा ही होगा। धर्मीजन अपनी सभी लालसाओं के अंतिम फल के रूप में केवल भलाई को ही पाएगा, क्योंकि वह परमेश्वर और मनुष्य दोनों से अनुग्रह पाएगा और वे उसे प्रतिफल देंगे। परन्तु दुष्ट मनुष्य चाहे किसी भी भलाई की आशा करे, उस पर क्रोध ही उंडेला जाएगा।

धर्मी की लालसा की तुलना दुष्ट की आशा से की जानी चाहिए। जैसा कि सुलैमान के कई नीतिवचनों हम पाते हैं, दो खंडों के बीच तुलनाएं उन दोनों ही खंडो के सिद्धांतों पर प्रकाश डालती हैं। दुष्ट खुद होकर और जानबूझकर अपने लिए क्रोध की आशा नहीं करते; बल्कि वे अपने सपनों को साकार करने और अच्छा जीवन जीने की उम्मीद करते हैं। इसलिए, धर्मियों की लालसा और दुष्टों की आशा उनके जीवन का प्रतिफल, अंतिम परिणाम या निष्कर्ष है।

शब्दों के ऐसे प्रयोग को शब्दादेश कहा जाता है, भाषालंकार का एक सामान्य रूप जहां एक संबंधित शब्द को सौंदर्य और बल जोड़ने के लिए उसके स्थान पर दूसरा समानार्थक शब्द प्रयुक्त किया जाता है, और जब नीतिवचन की बात आती है तो ऐसा भाषालन्कार कुतूहल उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। यहाँ ‘लालसा’ यह शब्दप्रयोग एक धर्मी व्यक्ति के जीवन के प्रतिफल, भविष्य या परिणामों को दिखाने के लिए एक उपनाम है। यहाँ ‘आशा’ यह शब्दप्रयोग एक दुष्ट व्यक्ति के जीवन के प्रतिफल, भविष्य या परिणामों को दिखाने के लिए एक उपनाम है।

धर्मी मनुष्य दूसरों के लिए और अपने लिए अच्छी बातों की लालसा करता है जिसके विषय में दुष्ट लोग जान भी नहीं सकते। लेकिन सबक यह नहीं है कि कैसे मनुष्य अलग-अलग चीजों की लालसा करते हैं – सबक यह है कि धर्मी मनुष्यों को जो प्राप्त होता है, वह दुष्ट लोगों के प्रतिफल के विपरीत होता है। धर्मीजन धन्य जीवन की लालसा करता है, और उसे वह प्राप्त होता है। दुष्टजन भी धन्य जीवन की लालसा करता है, परन्तु इसके बजाए उसे दण्ड ही मिलता है।

सुलैमान ने कुछ और नीतिवचनों में दुष्टों की आशा का वर्णन किया। ” जब दुष्ट मरता, तब उसकी आशा टूट जाती है, और अधर्मी की आशा व्यर्थ होती है” (नीतिवचन 11:7)। ” धर्मियों को आशा रखने में आनन्द मिलता है, परन्तु दुष्टों की आशा टूट जाती है” (नीतिवचन 10:28)। धर्मियों का भविष्य धन्य है; दुष्टों का भविष्य शापित है।

धर्मी जन यहोवा में आनन्दित रहता है, और परमेश्वर उसके मनोरथ को पूरा करता है (भजन 37:4)। वह हर समय बड़े जोश से परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हुए सच्चाई से चलता है, और परमेश्वर उससे कोई अच्छी वस्तु रख नहीं छोड़ता (भजन 84:11)। वह एक भक्तिपूर्ण जीवन जीता है, और परमेश्वर की लालसा करता है तथा उसी पर भरोसा रखता है कि वह उस पर दया करे और उसके परिश्रमों को आशीष दें। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर और मनुष्य दोनों से अनुग्रह पाता है, और वह ऐसे प्रतिफल की कटनी करता है जो इस जीवन और आनेवाले अनंतकाल के जीवन, दोनों के लिए भलाई ही का होता है।

एक दुष्ट व्यक्ति सोचता है कि वह अनिश्चित काल तक जीवित रहेगा, और वह परमेश्वर की परवाह किए बिना, अपने आप में और दुनिया के व्यर्थ वादों पर भरोसा करते हुए अपने लक्ष्यों का पीछा करता है। परन्तु जब उसके जीवन में मुसीबतें आती हैं, तब वह हैरान हो जाता है, कि यह कैसे हुआ, और फिर अपनी उम्मीदों को मिट्टी में मिलता देख मर जाता है। वह अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकता, बल्कि परमेश्वर का क्रोध उस पर सदा के लिए बना रहता है (प्रकाशितवाक्य 20:11-15)। यह परिणाम भयानक है, लेकिन एक स्वार्थी, पापपूर्ण जीवन शैली जीकर उसने यही चुना।

आपका भविष्य क्या है? सब बातों के अंत में आपको और आपके परिवार को क्या प्रतिफल मिलेगा? क्या आप आने वाले दिनों की एक झलक देखना चाहते हैं? यह नीतिवचन सच है। यह जो कहता है उस पर विश्वास करो। यकीन मानो कि ऐसा ही होगा। धर्मीजन अपनी सभी लालसाओं के अंतिम फल के रूप में केवल भलाई को ही पाएगा, क्योंकि वह परमेश्वर और मनुष्य दोनों से अनुग्रह पाएगा और वे उसे प्रतिफल देंगे। परन्तु दुष्ट मनुष्य चाहे किसी भी भलाई की आशा करे, उस पर क्रोध ही उंडेला जाएगा।

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