नीतिवचन 11:2

जब मनुष्य अभिमान करता है, तब अभिमान के साथ अपमान आता है, परन्तु बुद्धिमान व्यक्ति में नम्रता होती है।

मनुष्य का अभिमान, घमण्ड या अहंकार चीजों की परख करने की उसकी शक्ति को विकृत कर देता है। एक अभिमानी, घमण्डी, या अहंकारी व्यक्ति ऐसी ऐसी गलतियाँ करेगा जिसकी उसे भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है, लेकिन जो व्यक्ति नम्र और मन का दीन होता है वह सही और गलत, सच और झूठ, बुद्धिमानी और मूर्खता के बीच के फ़र्क को ठीक ठीक और स्पष्ट रूप से देख सकता है। आपकी महानता सब प्रकार के घमण्ड या अहंकार से छुटकारा पाने पर ही निर्भर करती है।

परमेश्वर ने राजा सुलैमान को आपका निजी सलाहकार बनने के लिए अपना वचन लिखने प्रेरित किया। अब तक के सबसे बुद्धिमान राजा ने आपकी सफलता और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण सलाह लिखी है। अभिमान आपको मूर्खतापूर्ण चुनाव करने के लिए उकसाएगा जिससे आपको ही शर्मिन्दा होना पड़ेगा और आपको मुँह की खानी पड़ेगी; परन्तु मन की दीनता आपको बुद्धिमानीपूर्ण फैसले लेने की ओर ले जाएगी।

सबसे बुरी चीज़ जो आप में हो सकती है वह है घमंड। इसकी आपको किसी भी अन्य चरित्र-दोष से अधिक क़ीमत चुकानी पड़ेगी। अहंकार तुम्हें धोखा देकर मूर्ख बना देगा, जो शीघ्र ही और निश्चित रूप से तुम्हें लज्जित कर देगा। लेकिन मन की दीनता बुद्धिमान बनने की ओर ले जाती है, जो लोगों को मूर्खतापूर्ण गलतियों और तत्पश्चात आनेवाली अप्रतिष्ठा या बदनामी से बचाती है।

क्या आप इस पाठ के महत्व को समझ पा रहे हैं? आपने अपने जीवन के लिए इससे अधिक महत्वपूर्ण चेतावनी न तो कभी सुनी होगी और न पढ़ी होगी। अभिमान आपका विनाश कर देगा, परन्तु यह अहंकार विनाश से पहले आपको सब मनुष्यों के सामने अपमानित और लज्जित कर देगा। मन की दीनता आपको परमेश्वर और भले मनुष्यों, दोनों की दृष्टि में ऊपर उठाएगी।

मूर्ख मनुष्य एक भयानक चीज़ है, जैसा कि सुलैमान अक्सर सिखाता था। लेकिन मूर्ख से भी बदतर एक व्यक्ति है – एक अहंकारी मूर्ख! उसने लिखा, “यदि तू ऐसा मनुष्य देखे जो अपनी दृष्टि में बुद्धिमान बनता हो, तो उससे अधिक आशा मूर्ख ही से है” (नीति 26:12)। मूर्ख के लिए बहुत कम आशा होती है – वह ज़िन्दगी से हारा हुआ व्यक्ति होता है; परन्तु अभिमानी मूर्ख के लिये तो कोई आशा ही नहीं। उसका अहंकार किसी भी शिक्षा या सुधार से इंकार कर देगा।

अभिमान मनुष्य को अंधा कर देता है। वह बुद्धि और ज्ञान को नहीं मानेगा कि अपने जीवन की मुसिबतों और सामाजिक शर्मिंदगी से बच सके। जब दूसरे लोग उन्हें कुछ सिखाने या सुधारने की कोशिश करते हैं, तो वे नाराज़ या क्रुद्ध हो जाते हैं। वे अति आत्मविश्वासी होते हैं. वे अहंकारपूर्वक अपनी सोच और विचारधाराओं को उच्च समझकर दूसरों को राय देने में जल्दबाज़ी करते हैं। अभिमान मूर्खता को जन्म देता है, और मूर्खता बदनामी तथा अप्रतिष्ठा को जन्म देती है।

घमंड और अहंकार से नफरत करें! अपने परामर्शदाता, सुलैमान की सलाह को सुनें। उसने लिखा, ” यहोवा का भय मानना बुराई से बैर रखना है। घमण्ड, अहंकार और बुरी चाल से, और उलट फेर की बात से भी मैं बैर रखती हूँ ” (नीति 8:13)। परमेश्वर का भय मानने के लिए, जो कि परमेश्वर से आशीष पाने की कुंजी है, अवश्य है कि आप घमंड और अहंकार से घृणा रखें।

अभिमान घिनौनी बुराई है। इसकी शुरुआत शैतान से हुई। यह शैतान के पतन का कारण बना। लूसिफ़र परमेश्वर के अभिषिक्त करूब के रूप में संतुष्ट नहीं था; वह परमप्रधान परमेश्वर के समान बनना चाहता था (एहेज 28:14; यशा 14:14)। परमेश्वर ने उसे स्वर्ग से बाहर फेंक दिया ताकि युगानुयुग के लिए उसकी अप्रतिष्ठा हो (यूहन्ना 12:31; प्रकाशितवाक्य 12:9,12)। उसकी पीड़ा का धुआं स्वर्ग की धूप होगा (मत्ती 25:41; प्रकाशितवाक्य 14:11)।

क्या आप अभिमान और अहंकार से घृणा करते हैं? अभिमान करना शैतान का पाप है. घमंड ने विश्व के सर्वोच्च प्राणी के गौरवशाली जीवन को बर्बाद कर दिया। अभिमान के कारण ही उसे युगानुयुग के लिए लज्जित कर पीड़ा में डाल दिया जाएगा। घमंड आपके जीवन की सबसे बुरी चीज़ है। इसकी कीमत आपको किसी भी अन्य पाप की कीमत से अधिक चुकानी पड़ेगी।

घमंड के कारण, उस समय के सबसे महान राजा, फिरौन ने खुद को, अपने परिवार को, अपने राष्ट्र को और अपनी सेना को नष्ट कर दिया (निर्गमन 5:2)। दुनिया पिछले 3500 वर्षों से उसके विनाश और अप्रतिष्ठा पर हंसती आ रही है (निर्गमन 15:1-21; 1 शमू 4:8; 6:6; नहेम 9:10; भजन 136:9,15; रोमियों 9:17)। यहाँ तक कि बच्चे भी फिरौन के घमंड के कारण उसके बिस्तर और रोटियों पर आ पड़े मेंढ़कों को देखकर आनन्दित होते हैं और हँसते हैं (निर्गमन 8:3)।

अहंकार के कारण ही, 500 वर्ष पहले परमेश्वर ने मिस्र के साथ जो किया था उसे याद करने के बावजूद, पलिश्तियों ने इस्राएल के विरुद्ध लड़ाई लड़ी (1 शमू 4:7-9)। परमेश्वर के सन्दूक पर कब्ज़ा करने के बाद, उन्होंने उसे अपने देवता दागोन की मूर्ति के सामने रख दिया, जो नीचे गिर गई और उन्होंने उसकी पूजा की (1 शमू 5:1-5)। तब परमेश्वर ने पूरे देश को गिलटियों की महामारी से पीड़ित किया, और राहत पाने का एकमात्र तरीका दोषबलि के रूप में पांच स्वर्ण गिलटियों के साथ सन्दूक को वापस करना था (1 शमू 6:1-5)!

उन्हें जिस लज्जा या शर्मिंदगी से गुजरना पड़ा उस पर विचार करें! पूरे देश के लोगों पर अपने गुप्त भागों को खुजाने की नौबत आई (1 शमू 5:9), और इसका सामना करने के लिए कोई पूर्व तैयारी भी नहीं की गई थी। पांच सोने की गिल्टियों को ढालना ही उनकी पीड़ा से मुक्ति पाने का एकमात्र रास्ता था। परमेश्वर उनकी इस अप्रतिष्ठा पर हँसा! उसने इस घटना का वर्णन करने के लिए भजन 78:66 को प्रेरित किया, जिसमे बड़े आनन्द से लिखा है, “उसने अपने शत्रुओं को पीछे से मारा; और उनकी सदा की नामधराई कराई (KJV)।” बिलकुल सच! उन्हें अपने घमंड के कारण हमेशा के लिए शर्मिंदा होना पड़ा। क्या मेल-बलि थी! परमेश्वर ने उन्हें एक मिसाल बना दिया!

घमंड के कारण, आज तक का सबसे महान और सबसे गौरवशाली राजा, नबूकदनेस्सर ने अपने हाथों और घुटनों के बल आकर घास के मैदान में रेंगते हुए सात साल बिताए। वह बैल की नाईं घास खाता था; उसके बाल उकाब के पंखों के समान बढ़ गये थें; उसके नाखून पक्षी के पंजों के समान बढ़ गए थें (दानि 4:33)। और फिर उसने इस वारदात की पूरी कहानी लिखी और अपने पूरे साम्राज्य में स्थानिय भाषाओं में भेज दी (दानि 4:1-3)। कैसा संकट! कितना शर्मनाक! और यह सब घमंड के कारण ही हुआ (दानि 4:30-31)।

अभिमान के कारण ही 37-44 ईस्वी में यहूदिया के राजा, हेरोदेस अग्रिप्पा प्रथम को, जिसने प्रेरित याकूब को मार डाला और प्रेरित पतरस को मारने की कोशिश की, परमेश्वर के दूत ने मारा डाला और उसे कीड़े खा गए, क्योंकि उसके इस अभिमान के कारण सोर और सीदोन के नागरिकों ने उसकी बड़ी प्रशंसा की थी। (प्रेरितों 12:1-4,20-23)। इतिहासकार जोसेफस ने अपने इतिहास में उसके मृत्यु की पुष्टि की है (यहूदी प्राचीनकाल; पुस्तक 19; 8:2)।

बाबेल की मीनार, मरियम, कोरह, बिलाम, उज्जिय्याह, हामान, अबशालोम और बेलशस्सर को मत भूलो। ये घमंड के शर्मनाक परिणामों के अन्य उदाहरण हैं। लेकिन अब, इन सब लोगों की अप्रतिष्ठा पर जश्न मनाना, जो वास्तव में परमेश्वर की पवित्र आराधना का ही कार्य है, बहुत हुआ। अब आपकी बारी है। आप अपने जीवन की किन किन बातों पर घमंड करते हैं? सावधानी से अपना आत्म-परीक्षण करें। ध्यान से देखें। क्या आपको कभी घमंड महसूस होता है कि आप फूले नहीं समा रहे हैं? जब आप दूसरों की सफलता को देखते है तो क्या घमंड उन पर ईर्ष्या से क्रोधित होने या जलने का कारण बनता है?

अभिमान या घमंड क्या है? यह आपके स्वयं के गुणों, उपलब्धियों, या संपत्ति के बारे में एक उच्च या अभिमानी सोच है, जो अपने प्रति श्रेष्ठता के दृष्टिकोण की भावनाओं और दूसरों को नीचा देखने की ओर ले जाती है; यह अपने को सर्वोपरि, सबसे आदरणीय समझना है। अहंकार क्या है? यह अपने बारे में उच्च राय रखना, अपने गुणों को अधिक महत्व देना और व्यक्तिगत घमंड या गर्व है।

अहंकार सोचता है कि आप महत्वपूर्ण व्यक्ति (वि.आय.पी) हैं। आपके बारे में जब बातें होती है और आपसे सम्बंधित घटनाओं का ज़िक्र होता है, तब अहंकार उसका आनंद लेता है। अहंकार मानता है कि आपके विचार और राय सही हैं। अभिमान सुधार और शिक्षा को नापसंद करता है। अभिमान दूसरों की खूबियों, योग्यताओं या सम्मान से ईर्ष्या करता है। अभिमान दूसरों से सलाह लेने से बचता है। अभिमान दूसरों को तुच्छ समझता है। प्रिय पाठक, इस विवरण को दोबारा पढ़ें।

परमेश्वर जल उठनेवाला परमेश्वर है। उसका नाम जलन है (निर्ग 34:14)। वह समर्थ है, और वह उन लोगों को नीचा दिखा देगा जो घमंड की चाल चलते हैं (दानि 4:37; अय्यूब 40:11-12)। वह आपके मन के विचारों और इरादों को देखता और जानता है (इब्रानियों 4:12)। आपको स्वयं का बारीकी से निरीक्षण करना चाहिए, अपने जीवन में घमंड के बीज ढूंढ़ने होंगे और उन्हें जल्दी और पूरी तरह से जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। अगर आप उससे बिनती करेंगे तो वह अवश्य ही आपकी मदद करेगा।

परमेश्वर की दृष्टि में, आप कुछ भी नहीं हैं, आपका मूल्य ही क्या है (भजन 39:5; 62:9; 113:6; यशा 40:17)। तुम उसके सामने एक कीड़ा हो (अय्यूब 25:6)। तुम एक ऐसे प्राणी मात्र हो जिसकी श्वास उसके नथनों में है (यशा 2:22)। इस कारण वह अभिमानियों से बैर रखता है, और उन्हें पतंगे की नाईं पीस डालेगा, और मोम की नाईं पिघला देगा (नीति 6:16-17; भजन 39:11; 68:2)। बुद्धि इस सत्य से प्रेम करना सीखती है।

अभिमान प्रत्येक मनुष्य के लिए एक परीक्षा की घडी होती है, और शैतान की प्राथमिक युक्तियों में से एक है (1 युहन्ना 2:16)। उसने हव्वा को परमेश्वर के समान बनने के लिए फुसलाया, और उसने यीशु मसीह के सामने जगत के राज्य देने का प्रस्ताव रखकर उसकी परीक्षा ली। तुम्हारा भ्रष्ट मन स्वभावतः जन्म से ही उससे भरा हुआ है। यदि आप सोचते हैं कि आपको इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है तो आप पहले से ही घमंडी मूर्ख हैं। मन की दीनता या नम्र होना केवल वे ही लोग सीख सकते हैं जो जानते हैं कि वे घमंडी हैं। यह सोचना कि आपने घमंड को हरा दिया है, अपने अहंकारी दंभ को साबित करना है!

आज अभिमान को आत्म-सम्मान या आत्म-विश्वास कहकर उसे बढ़ावा दिया जाता है और फिर इसे मनुष्य की कई समस्याओं का इलाज कहकर उसका महिमामंडन किया जाता है। ‘नंबर एक’ बनने के बारे में किताबें लिखी और बेची जाती हैं, और खुद से प्रेम करने को सबसे बड़े प्रेम के रूप में महिमान्वित किया जाता है। सोशल मीडिया को जीवन के लिए लगभग आवश्यक माना जाता है, हालांकि यह अहंकारी नशे से कुछ अधिक नहीं है।

आपको घर से शुरुआत करनी होगी। आप अहंकार को अपनी आत्मा से जड़ से उखाड़ फेंके यह ज़रूरी है, और फिर आपको इसे अपने परिवार से भी जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। माता-पिता को अपने बच्चों को मन की दीनता सिखाने और उनमें दिखाई देने वाले अहंकार को दूर करने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। चर्च के पास्टरों को इसे अपनी कलीसियाओं से जड़ से उखाड़ फेंकना होगा।

परमेश्वर के सेवकों में घमंड या अपनी इच्छा नहीं हो सकती (1 तीमु 3:6; तीतुस 1:7), क्योंकि इससे वे परमेश्वर के कार्य में उन्मत्त हो जायेंगे। वे स्व-प्रवर्तक (अपना ही प्रचार करनेवाले) नहीं हो सकते। शिक्षकों और शासकों को पहले खुद को आलोचनात्मक रूप से जांचने और दूसरों से सीखने के लिए पर्याप्त विनम्र होना चाहिए, इससे पहले कि उन्हें दूसरों को सिखाने और जांचने के पद पर रखा जाए (1 तीमु 4:16; 2 तीमु 2:15)।

अभिमान मूर्खता का कारण बनता है, जिससे शर्मिंदगी और लज्जा का सामना करना पड़ता है। यह मनुष्यों को अंधा कर देता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे हमेशा सही होते हैं (नीति 12:15; 14:16; 26:12; 28:26)। इसलिए वे सलाह और सुधार को, जो कि उनकी ही भलाई के लिए है, अस्वीकार करते हैं और नाराज़ या क्रुद्ध हो जाते हैं (नीति 21:24; 22:3)। वे सत्ता में बैठे लोगों का अनादर करते हैं। वे जल्दबाजी में निर्णय लेते हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में वे संभवतः कभी गलत नहीं हो सकते (नीति 14:29; 19:2; 28:22; 29:20)।

अभिमान संघर्ष का कारण बनता है, क्योंकि अभिमानी लोग अपने विचारों या पद की रक्षा के लिए लड़ेंगे (नीति 13:10; 21:24; 28:25)। वे दूसरों की सेवा करने के लिए तब तक नहीं झुक सकते, जब तक इससे उनका ही सबसे भला न हो। और वे परमेश्वर या मनुष्यों के सामने अपनी गलतियों को नहीं मानते। ऐसा मार्ग मनुष्य को मूर्खतापूर्ण निर्णयों और ज़िद्दी विद्रोह और उनके भयानक परिणामों – विनाश और बदनामी- की ओर ले जाएगा।

मन की दीनता ही बुद्धिमत्ता है। जो नाम का दीन होता है वह अपने ज्ञान या नेकियों पर भरोसा नहीं करता है, वह परमेश्वर के वचन के सामने थरथराता है, दूसरों की सलाह को मूल्यवान जानकर उसकी सराहना करता है और उसका सम्मान करता है, सुधार को बड़े आनंद से स्वीकार करता है, गलतियों को तुरंत मान लेते है और गलतियों से सबक लेकर अपना जीवन बदल लेता है। ऐसे मनुष्य को परमेश्वर से आशीष मिलेगी ही।

मन की दीनता बुद्धि और ज्ञान का निश्चित मार्ग है, जो मनुष्य को मुसिबतों और शर्म से बचाती है, लेकिन केवल मन के दीन लोग ही इसे खोज पाते हैं। अभिमानी अपने अहंकार के कारण अंधे हो जाते हैं और सच्ची बुद्धि को कभी प्राप्त नहीं कर पायेंगे, और स्वर्ग का ईर्ष्यावान परमेश्वर उन्हें अंधा बनाए रखेगा, ताकि वह अपने नम्र और कोमल बच्चों को बुद्धि से आशीषित कर सके (मत्ती 11:25-27)। क्या आप नम्र और दीन होने का महत्व समझ सकते हैं?

अहंकारी मनुष्य को परमेश्वर कभी आशीर्वाद नहीं देगा (नीति 16:5)। वह उस मनुष्य के निकट आता है जो मन का दीन है (57:15; 66:2; 1 पतरस 5:5-6)। यदि आप घमंड को चुनते हैं, तो परमेश्वर आपका शत्रु बन जाएगा और आपको पीड़ा देकर झुकाएगा (नीति 16:18; 18:12)। यदि तुम प्रसन्नतापूर्वक नम्रता को चुनोगे, तो परमेश्वर तुम्हें महिमा से ऊपर उठाएगा (लूका 14:11)। एक अमीर घमंडी इंसान होने की अपेक्षा एक गरीब विनम्र इंसान बनना अधिक भला है, क्योंकि परमेश्वर जल्द ही नियति में एक बड़ा उलटफेर करने पर है (नीति 16:19)। जागृत रहकर प्रतीक्षा करें!

यीशु मसीह ने सबसे बड़ी मन की दीनता और बुद्धिमत्ता को प्रदर्शित किया, जब वह स्वर्ग की महिमा को त्यागकर गरीबी में जीने और क्रूस की दर्दनाक मृत्यु मरने के लिए इस जगत में आया (फिलिप्पियों 2:5-8)। उसने लज्जा की चिन्ता को तुच्छ जाना (इब्रानियों 12:2)। परन्तु परमेश्वर ने अब उसे सभी प्रधानताओं और अधिकारों से बहुत ऊपर उठाया है, हाँ, शैतान और उसके सभी स्वर्गदूतों से भी बहुत ऊपर (फिलिप्पियों 2:9-11; इफि 1:20-23)। अब वह धन्य और एकमात्र सामर्थी प्रभु तुच्छ नहीं रहा, क्योंकि वह आपकी सभी प्रशंसा और आराधना के योग्य बन गया है। उसकी ही महिमा और आराधना करो, अपनी नहीं।

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