नीतिवचन 11:14

जहाँ विचार-विनिमय नहीं, वहाँ प्रजा विपत्ति में पड़ती है; परन्तु सम्मति देनेवालों की बहुतायत के कारण बचाव होता है।

किसी नए कार्य का आरम्भ करने से पूर्व अच्छे निर्णय कैसे लिए जाएं यह न तो आप जानते हैं और न ही आपकी सरकार। ग़लत निर्णयों से बचाव का एकमात्र मार्ग है बुद्धिमान मनुष्यों की बहुतायत में खोज करके उन्हें पहचानना ताकि महत्वपूर्ण निर्णय लेने में वे आपकी सहायता कर सकें। यदि कोई सरकार जल्दबाज़ी में, अहंकार में, या किसी एक ही व्यक्ति की मर्जी से निर्णय लेकर उन्हें अंजाम देती है, तो उस देश पर भ्रष्टाचार और संकट का अन्धकार अवश्य ही छा जाएगा। परन्तु जब एक सरकार बहुत से बुद्धिमान और विवेकी सलाहकारों के एक व्यापक दायरे में रहकर सुनती और निर्णय लेती है, तो देश के सभी नागरिकों की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित होती है।

परमेश्वर ने सुलैमान को नीतिवचन लिखने प्रेरित किया ताकि जवानों को बुद्धिमान बनने की शिक्षा दे (नीति 1:1-5)। यहां समझदारी और बुद्धि का एक महत्वपूर्ण नियम है। बहुत से बुद्धिमान और सफल मनुष्यों से सलाह-मशवरा किये बिना बड़े-बड़े निर्णय न ले, अर्थात् ऐसे मनुष्यों से जो भावनात्मक, व्यक्तिगत और आर्थिक रूप से अनुभवी रहे हैं। वे बिना आपका ध्यान भटकाए या बिना आप के उद्देश्य को विकृत किए, जिससे कि आपकी सोच भ्रष्ट हो जाए, वे अपनी बुद्धि-ज्ञान, और अनुभव आपकी परिस्थिति पर लागू कर सकते हैं।

मनुष्य का प्रत्येक मार्ग उसकी अपनी दृष्टी में सही दिखाई देता है। इसमें कोई शक नहीं, नहीं ना? क्या आप ने कभी कोई ग़लत निर्णय लिया है। बिलकुल नहीं। बराबर? अपनी ग़लतियों को न मानना यही मनुष्य का चाल-चलन है जिस पर सुलैमान ने अक्सर गौर किया (नीति 14:12; 16:2, 25; 21:2)। परन्तु आप अक्सर ग़लत होते हैं जिसके कारण होते हैं, फिर भले ही आप इसे न माने। आप जन्म से ही अज्ञानी हैं, भावनात्मक रूप से पीड़ित हैं, व्यक्तिगत रूप से एक-तरफा, अर्थात् अपना ही पक्ष लेनेवाले हैं, शिक्षा में पथभ्रष्ट किए हुए हैं, आर्थिक लाभ के लिए ललचाए गए, और यारी-दोस्ती से प्रभावित हैं। आप ही अपने लिए खतरा हैं।

हर एक परामर्शदाता, या सम्मति देनेवाला सही परामर्श नहीं देगा। अगर आप अपनी योजनाओं और निर्णयों के सम्बन्ध में केवल अपने मित्रों से सलाह-मशवरा करते हैं, तो उन में से ज्यादातर आपके साथ सहमत हो जाएंगे ताकि आपके साथ अपनी मित्रता बनाए रखें, और बहस-बाजी से बच सके। सुलैमान के पुत्र रहोबाम के साथ यही हुआ। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् उसने अपने पिता के बुजुर्ग और बुद्धिमान परामर्शदाताओं की सम्मति को न सुनकर अपने अनुभवहीन मित्रों की सुनी। इस मूर्खतापूर्ण चुनाव के परिणामस्वरूप, उसने अपने देश के 12 गोत्रों में से 10 को अपने शत्रु के हाथों खो दिया (1 राजा 12:1-20)।

कहा जाता है कि, “अधिकार और सामर्थ्य मनुष्य को बिगाड़ देते हैं, परन्तु सम्पूर्ण अधिकार और सामर्थ्य पूरी तरह से बिगाड़ देते हैं।” इस कारण अधिकार के इस भ्रष्ट करने वाले प्रभाव को पराजित करने के लिए अवश्य है कि जो लोग अगुवाई के पदों पर बैठें हैं, उन्हें सम्मति देनेवालों पर अत्यंत निर्भर रहना चाहिए। यदि वे अकेले ही अपने दम पर सबकुछ करने का प्रयास करते हैं, तो वे अपने पद और उनके अधीन अभागे लोगों के लिए एक बहुत बड़ा खतरा उठा रहे हैं। काश अगर सभी पतियों, पिताओं, स्वामियों, पास्टरों, और शासकों ने सम्मति देनेवालों की बहुतायत का उपयोग किया होता तो कितने प्राणों, जीवनों, और सम्पत्ति को बचाया जा सकता था।

द्वितीय विश्वयुद्ध पर विचार करें। सलाहकार ब्रिटिश प्रधानमन्त्री चेम्बरलेन को हिटलर के झूठ से बचा सकते थे। यदि हिटलर अपने सैन्य सलाहकारों पर भरोसा रखता, तो वह सोवियेत संघ को पराजित कर सकता था। सलाहकारों ने जापान को अमरीका के साथ युद्ध करने से बचाने का प्रयास किया, पर उनकी न सुनी गई। और सोवियत संघियों को निकाल देने की सेनाध्यक्ष पैटन की सलाह को और भी अधिक गम्भीरता से लिया जाना चाहिए था। ये ऐसे निर्णय थे जिस के कारण कईयों का पतन हुआ और मारे गए, और ये उस दूसरे विश्वयुद्ध से जुड़े कुछ ही मामले हैं। इतिहास इससे भी भयावह हैं।

बुद्धिमान मसीही जानते हैं कि देश देश पर परमेश्वर की सम्प्रभु सत्ता ही द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण, क्रम, और अंत थी, इस कारण उन्हें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर ही देश देश में अपनी इच्छा को अंजाम देने के लिए सलाहकारों को विपरीत बुद्धि पर छोड़कर अपने न्याय के कार्य में बुद्धि के इस नियम के ऊपर कार्य कर सकता है। वह ऐसा करने में समर्थ है और वह यह अपनी सुइच्छा से करता है, और इतिहास में उसने ऐसा किया है (अय्युब 5:12-14; 2 शमू. 15:31; 1 राजा 22:19-23; भजन 9:15-17; यशा 19:11-14; 29:9-16; 1 कुरिं. 1:19-20; 3:18-20)।

यदि आप बुद्धि में बढ़ना और उन्नति करना चाहते हैं, तो आप अपने विचारों और कल्पनाओं को फ़ेंक देंगे, और उनके स्थान पर बुद्धिमान सलाहकारों के विचारों को ग्रहण करेंगे। ऐसा फैसला लेना कठिन होता है, क्योंकि अपनी आलोचना सुनना या आप में सुधार किया जाए इससे आप घृणा करते हैं जो कि आप के पापी स्वभाव का ही एक गुण है। आप एक ऐसा बुद्धिमान मनुष्य बनना चाहते हैं जो हमेशा ही बेहतर निर्णय लेता है। अवश्य है कि आप अपने घमण्ड को कुचलना सीखे और अपने विचारों और योजनाओं को दूसरों के द्वारा उनका विश्लेषण और समीक्षा किये जाने के लिए समर्पित कर दें। अपने सलाहकारों के रूप में धर्मी और सफल मनुष्यों को चुनकर आप अपने निर्णयों की गुणवत्ता को बढ़ाएंगे और नतीजों में शीघ्रता से उन्नति करेंगे।

सर्वश्रेष्ठ सलाहकार वे हैं जो परमेश्वर के वचन को जानते हैं, और जिसे वे आपके जीवन और चुनावों के लिए काम में ला सकते हैं (नीति 22:17-21; अय्युब 32:6-22; 33:23-24; भजन 119:98-100; 2 तिमु. 3:16-17)। बाइबल के विपरीत सलाह देनेवाले सलाहकार, सलाह ही न होने से भी बद्तर हैं; ऐसा सलाहकार विनाशकारी है (यशा 8:20; 1 तिमु. 6:3-5)। क्या आपके जीवन में धर्मी और परमेश्वर का भय माननेवाले सलाहकार हैं (मलाकी 2:7; प्रेरितों. 8:30-31; इब्रा. 13:7, 17)? क्या आप उनके लिए जिन्हें आपकी ज़रुरत है, ऐसे सलाहकार हैं (नीति 11:30; 15:4; इब्रा. 5:12-14; 1 पतरस 3:15)? आपको यीशु मसीह की एक सच्ची कलीसिया में धर्मी सलाहकार मिलेंगे।

नीतिवचन और उनकी व्याख्या हर दिन मुफ़्त पाएँ। चैनल खोलें, “फ़ॉलो करें” पर टैप करें और नोटिफ़िकेशन की घंटी चालू करें।