नीतिवचन 10:28
धर्मियों की आशा आनंद है : परन्तु दुष्ट की आशा नाश होगी। (केजेवी)
जो मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता है उसका भविष्य उज्वल होता है। जो मनुष्य पाप को चुनता है, वह नाश पाएगा। भविष्य के लिए हर व्यक्ति की महत्वकांक्षाएं और योजनाएं होती हैं, परन्तु केवल धर्मी व्यक्ति ही आशीषों और समृद्धि को पाएगा। दुष्ट अपनी महत्वकांक्षा को प्राप्त नहीं कर पाएगा, और अंत में नरक में जाएगा। सबक सरल है। परमेश्वर की आज्ञा मानने का प्रतिफल आज और कल भी मिलेगा। पाप कभी सफल नहीं होगा।
इस के पहले के नीतिवचन में वर्णित जीवन की दिर्घता से तुलना करे (नीति 10:27)। धार्मिकता जीवन को बढ़ाती है। परमेश्वर ने इसकी निश्चयता दी (इफि 6:1-3); सुलैमान ने इसकी पुष्टि की (नीति 3:2, 16; 4:10; 9:11)। परन्तु दुष्टों की आयु कम हो जाएगी। सुलैमान ने इसकी घोषणा की (नीति 2:22; 11:19)। अनुभव इसकी पुष्टि करता है। पापमय जीवन और सांसारिक लोकप्रियता मानव जीवन को छोटा कर देती है।
विवाह से तुलना करें (नीति 12:4)। एक स्त्री और एक पुरुष बड़ी आशा और मोहब्बत से भरी अपेक्षाओं के साथ विवाह बंधन में बंधते हैं। परन्तु वह दुष्ट मनुष्य शीघ्र ही अपनी सब आशा खो देता है जब उसकी जीवनसाथी एक घिनौनी अत्याचारी साबित होती है, जिसकी पुष्टि प्रतिदिन हज़ारों तलाकों से होती है (नीति 11:22; 30:21-23)। धर्मी मनुष्य, जो अपने जीवनसाथी में परमेश्वर के भय की मांग करता है, अपनी सद्गुणी पत्नी के साथ बड़े सुख से आनन्दविभोर होता है (नीति 19:14; 31:10-31)।
बच्चों से तुलना करें (नीति 10:1; 19:13)। एक दुष्ट व्यक्ति उम्मीद करता है कि इस संसार के अधर्मी धर्मनिरपेक्ष विद्वानों की बाल-संगोपन की कपोल-कल्पनाएं उसके बच्चों को ‘परफेक्ट’ बेटा और ‘परफेक्ट’ बेटी बनाएगी। परन्तु उसकी सब उम्मिदें धरी की धरी रह जाती है जब वह अपने अनैतिक, अपुरुषी, और सिफारशी पालकत्व के नतीजों के रूप में अपने घमण्डी, लालची, आलसी, और स्वार्थी बच्चों को देखता है। बुद्धिमान मनुष्य, जो परमेश्वर पर, सुलैमान पर, और छः हज़ार वर्षों के मानव-इतिहास पर विश्वास करता है, वह पालकत्व के महान आनंद की प्राप्ति के लिए अपने पुत्र में विद्यमान मूर्खता को प्रशिक्षण देकर उसे बुद्धिमान बनाता है (नीति 22:6, 15; 29:15, 17)।
एक धर्मी व्यक्ति की तुलना एक दुष्ट व्यक्ति से करनेवाले उदाहरणों को अनिश्चित काल के लिए गुणा किया जा सकता है, जिन में दुष्ट व्यक्ति की आशाएं हमेशा नष्ट होती हैं (भजन 34:12-16)। इब्राहीम की लूत से, मूसा की फिरौन से, दाऊद की शाऊल से, और दानिय्येल की बेलशस्सर से तुलना करें। परन्तु एक और तुलना है जो दिर्घायु, विवाह, या बच्चों से कहीं अधिक गम्भीर है। मृत्यु के उस पार के जीवन को लेकर आशा और उम्मीदों की तुलना। मृत्यु के पश्चात् केवल धर्मीजन ही आनंद पाएंगे!
दुष्ट लोग सोचते हैं कि वे युगानुयुग जीवित रहेंगे, या कम से कम अपने पीछे एक चिरस्थायी विरासत छोड़ जाएंगे (भजन 49:6-14; 73:1-20)। परन्तु वे शीघ्र ही मिट जाएंगे, उनका कोई स्मरण नहीं रहता, वे कब्र में सड़ जाते हैं, और अन्त में आग की झील में डाल दिए जाएंगे (नीति 11:7; लूका 12:16-20; 16:19-26)। वे आशा करते हैं कि वे स्वर्ग जाएंगे, या शायद हमेशा के लिए पूरी तरह से अस्तित्वहीन हो जाएंगे; परन्तु जब वे जाग उठेंगे, तो अपने को नरक की यातनाओं में पाएंगे (मत्ती 7:21-23; 23:33; 25:31-46)।
धर्मी मनुष्य अनन्त जीवन की पक्की प्रतिज्ञा के साथ जीवित रहता है (अय्यूब 19:25-27)। उस की आशा स्वर्ग का आनन्द है, और वास्तविकता उन सब से कहीं अधिक होगी जिसकी वह इस पृथ्वी पर रहते कल्पना भी नहीं कर सकता (1 कुरिं 2:9)। प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं उस आनंद को देखा जो कब्र के उस पार प्रतीक्षा कर रहा था, और क्रूस पर चढ़ाए जाने की भयानक मृत्यु उस आनंद की तुलना में कुछ भी नहीं थी (भजन 16:8-11; इब्रा 12:1-3)।
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