नीतिवचन 10:20

धर्मी के वचन तो उत्तम चाँदी हैं; परन्तु दुष्टों का मन बहुत हल्का होता है।

यहाँ एक अनमोल नीतिवचन है। क्या आप बुद्धि के इस नियम को और इसके पाठ की शिक्षा को समझ रहे हैं? धर्मी मनुष्य का मन शुद्ध होता है, और इस कारण उसके मुंह के वचन उत्तम और मूल्यवान होते हैं। दुष्ट मनुष्य का मन टेढ़ा और मूल्यहीन होता है, और इस कारण उसकी बातें मूर्खतापूर्ण और दूसरों को ठेंस पहुंचानेवाली होती हैं। यहाँ तुलना अच्छे और बुरे इंसानों के मन और उनके मुंह के वचन दोनों के बीच की जा रही है।

इस नीतिवचन का विश्लेषण करते समय इन नीतिवचनों के स्रोत को याद रखें। हालाँकि चीजों का निरिक्षण सुलैमान ने किया किया और इन इन गुप्त बातों को लिखा, परन्तु उनका मूल परमेश्वर का आत्मा है, जिसने उसके शब्दों को प्रेरित किया (सभो 12:9-11; 2 पतरस 1:21)। चूँकि पूरी बाइबल का लेखक एक ही है, हम इस नीतिवचन को समझने के लिए पवित्रशास्त्र के अन्य भागों से मदद ले सकते हैं (1 कुरिन्थ 2:13; 2 पतरस 1:20)।

यह तो साफ़ है कि धर्मी, जो भले इन्सान होते हैं, उनकी तुलना दुष्टों से, जो बुरे इन्सान होते हैं, की जा रही है। धर्मी वे हैं जिन्हें परमेश्वर ने अपनी संतान होने के लिए चुना और उन्हें ख्रिस्ट में धर्मी ठहराया है। लेकिन उनमें ऐसा क्या है जो चाँदी के समान मूल्यवान है? यह उनके मुँह के वचन ही हैं, जो मूल्यवान हैं, और जीभ उन्हें बोलने का साधन है (नीतिवचन 10:21; 25:11)।

दुष्ट वे हैं जो अपने पापों में छोड़ दियें जाते हैं और जिन्हें उनका कुटिल और भ्रष्ट मन आदम से विरासत में, अर्थात् जन्म से ही मिला है। और इन बुरे लोगों में ऐसा क्या है जो मूल्य में बहुत हल्का होता है? उनके सीने का वह अंग जिसे दिल कहते है? नहीं, बल्कि यह उनके मुंह की कुटिल और अपवित्र बातें हैं, जो उनके दुष्ट मनों से निकलती हैं। यह नीतिवचन धर्मी मनुष्यों के अच्छे मनों और मुंह के अच्छे वचन की तुलना दुष्ट मनुष्यों के बुरे मनों और मुंह के बुरे वचन से करता है।

आपके मुंह के वचन आपके अनुग्रहकारी मन को प्रगट करते हैं। यीशु ने कहा, “हे साँप के बच्चो, तुम बुरे होकर कैसे अच्छी बातें कह सकते हो? क्योंकि जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है। भला मनुष्य मन के भले भण्डार से भली बातें निकालता है, और बुरा मनुष्य बुरे भण्डार से बुरी बातें निकालता है” (मत्ती 12:34-35)।

सुलैमान जानता था कि मन और मुंह के वचनों के बीच गहरा संबंध है। उसने लिखा, “जो मन की शुद्धता से प्रीति रखता है, और जिसके वचन मनोहर होते हैं, राजा उसका मित्र होता है” (नीतिवचन 22:11)। वह जानता था कि मुंह के अनुग्रहकारी वचन राजाओं के लिए मूल्यवान हैं (नीतिवचन 16:13; 1 शमू 18:1; सभो 10:12)। अच्छी बातें बोलने की क्या ही अद्भुत प्रेरणा है! वह जानता था कि मन जीतने वाले मुंह के ऐसे वचन और शब्द एक नेक और कुलीन मन से आते हैं, जो दुष्टों के पास स्वभाव से नहीं होता है (भजन 58:3; यिर्मयाह 17:9)।

मूर्ख कहते हैं, “तुम मेरे मन को नहीं जानते।” परन्तु मनुष्य के मन की पहचान उसके मुंह के वचनों से होती है। यदि उसके मुंह के वचन निर्दयी, मूर्खतापूर्ण या विकृत हैं, तो समझो कि उसका मन दुष्ट है। यदि उसके मुंह के वचन अनुग्रहकारी, बुद्धिमान और मन-भावने हैं, तो समझो कि उसका मन शुद्ध है। प्रत्येक मनुष्य का न्याय उसके शब्दों से किया जाएगा, चाहे निकम्मा क्यों न हो; आप अपने मुंह की बातों से या तो धर्मी ठहराये जायेंगे या दोषी ठहराये जायेंगे (मत्ती 12:36-37)।

पाठक, अपने मन को परखो (भजन 139:23-24; 2 कुरिन्थ 13:5)। क्या आप हर समय अनुग्रहकारी, धर्मी और बुद्धिमान विचारों को प्रिय जानते हैं? अपने मन की पूरी सिद्दत से रखवाली करें, क्योंकि जीवन के सब विषय वही से तो निकलते हैं, जिसमें आपके मुंह के वचन भी शामिल हैं (नीतिवचन 4:23)। अपने अपने मुंह से कहें वचनों से जो जो पाप किएँ हैं, उन्हें मान लें और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपकी ज़बान को लगाम लगाने और उचित बातें बोलने के लिए सहायता करें (अय्यूब 34:31-32; यशा 6:1-5; भजन 19:14)। आपके द्वारा बोला गया प्रत्येक शब्द शुद्ध चांदी के समान हो – परमेश्वर की महिमा और दूसरों के लाभ के लिए।

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