नीतिवचन 10:11
धर्मी का मुँह तो जीवन का सोता है, परन्तु उपद्रव दुष्टों का मुँह छा लेता है।
आपका मुंह आपके मन का छेद है। यह मन का निकास है जो आपके मन में क्या है उसे बाहर उगल देता है। धर्मी का मन भला और नेक होता है, और उसका मुंह उसके चारों ओर के लोगों के लिए जीवन का सोता होता है। वह उन्हें तसल्ली देता है, उन्हें प्रोत्साहित करता है और शिक्षा देता है। दुष्ट का मन दुष्ट होता है, और उसका मुंह उपद्रव से भरा होता है। वह अपने आसपास के लोगों को चोट पहुँचाता है और जीवनों को नष्ट करता है।
आप किसी मनुष्य के मन को उसकी बातों से जान सकते हो (नीतिवचन 10:20)। बहुत से लोगों को यह कहना अच्छा लगता है, “आप मेरे मन को नहीं जानते,” लेकिन उनके होठों से जिस प्रकार के शब्द निकलते हैं उनसे उनके मन को जानना आसान है। कोमल, अनुग्रहपूर्ण, उपयुक्त, दयालु, और विनम्र वाणी एक सदाचारी हृदय को प्रकट करती है। परन्तु कटु, आलोचनात्मक, क्रूर, कठोर, नकारात्मक, या निंदात्मक शब्द एक भ्रष्ट हृदय को प्रमाणित करते हैं।
प्रभु यीशु मसीह ने इस नीतिवचन को समझाया। उसने कहा, “हे साँप के बच्चो, तुम बुरे होकर कैसे अच्छी बातें कह सकते हो? क्योंकि जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है। भला मनुष्य मन के भले भण्डार से भली बातें निकालता है, और बुरा मनुष्य बुरे भण्डार से बुरी बातें निकालता है” (मत्ती 12:34-35)।
यह नीतिवचन सुलैमान का अवलोकन है। आप किसी व्यक्ति के चरित्र को उसके मुँह की बातों से माप सकते हैं। भला मनुष्य मनभावने वचन बोलना जानता है, और वह उन्हें सही समय पर कहता है (नीतिवचन 10:32; 15:23; 25:11)। उसका यह सद्गुण आपको उसके होठों को चूमने के लिए प्रेरित करता है (नीतिवचन 24:26)! वह एक अच्छे उद्देश्य से बोलता है – दिलासा देने, चंगा करने, प्रोत्साहित करने, सिखाने या चेतावनी देने के लिए (नीतिवचन 13:14; 15:7)। वह अपने आसपास के लोगों की मनशांति, सुख और समृद्धि में वृद्धि करता है (नीतिवचन 12:18; 15:26; 16:24; 18:4)।
दुष्ट व्यक्ति अपने मुंह पर क़ाबू नहीं कर सकता, इसलिए उसका मुँह उसके मन की दुष्टता का ज्वालामुखी उगल देता है। वह आवश्यकता से कहीं अधिक बोलता है (नीतिवचन 15:2,28; सभोपदेशक 10:12-14)। उसके मुंह से निकलनेवाली निष्ठुर, नफ़रत, और तानों से भरी तलवार दूसरों को लहूलुहान कर देती है (नीतिवचन 12:18; भजन 52:2)। वह दूसरों की निंदा, बदनामी, चुगलखोरी, या पीठ पीछे बुराई करने के द्वारा दूसरों की जिस प्रतिष्ठा को बर्बाद करता है उस पर कोई पछतावा या दुःख नहीं होता है (नीतिवचन 26:20-28)। वह अक्सर झूठा गवाह बनता है और झूठ बोलता है (नीतिवचन 14:5; 18:21; 25:18)।
इस नीतिवचन में दो रूपक हैं। धर्मी का मुंह जीवन का सोता क्यों है? यह एक ऐसा स्थान है जहाँ से निकलनेवाली स्फूर्तिदायक बातें आपकी व्याकुल आत्मा को संतुष्ट कर सकती हैं और उसे नया बल दे सकती हैं। उपद्रव दुष्टों का मुँह कैसे छा लेता है? उसके मुँह में स्फूर्तिदायक जल नहीं होता है, क्योंकि उसका मुँह केवल उपद्रवी है। “छा लेता है” के लिए कुछ और शास्त्र-संदर्भ देखें और तुलना करें (भजन 73:6; यिर्मयाह 3:25)।
पाठक, आप इस पाठ का क्या करेंगे? क्या दूसरे लोग आपकी बातों को सुनने और आपसे बातें करने के लिए वैसे ही तरसते हैं जैसा एक प्यासा जल-धाराओं के लिए तरसता है? क्या आपकी वाणी उनके जीवन को आशीषित करती और उनकी उन्नति करती है? या कही ऐसा तो नहीं कि दूसरे लोग आपके आस-पास होने से डरते हैं, क्योंकि आपके शब्द आलोचनात्मक, नकारात्मक और विनाशकारी होते हैं? यदि आपके पास कहने के लिए मनभावनी बातें नहीं हैं, तो अपनी इस कमी को परमेश्वर के सामने स्वीकार करें और आपको नया ह्रदय देने के लिए उसके सामने गिड़गिड़ाए।
आप अपने मुँह से निकलनेवाली बातों के बारे में क्या सोचते हैं, इससे बिलकुल कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इस संसार में रहते आपका मन सबसे अधिक धोखा देनेवाला है (यिर्मयाह 17:9-10)। आपके मुँह के वचन कितने मूल्यवान हैं इसकी परीक्षा आप इस बात से कर सकते हैं कि दूसरे आपकी उपस्थिति में कितनी देर तक रहना चाहते हैं और कितना आपके वचनों को सुनना चाहते हैं। यदि आपके मित्र कम हैं, तो इसका कारण यह है कि आपका मुंह काफ़ी हद तक बहुत उपद्रवी है। अपनी वाणी को शुद्ध करो!
आप अपनी वाणी को कैसे सुधार सकते हैं? यदि आप बहुत बातें करते हैं, तो आज से ही कम बोलना शुरू करें (नीतिवचन 17:27-28; याकूब 1:19)। सुनिश्चित करें कि आपकी बोली हमेशा अनुग्रहपूर्ण हो (नीतिवचन 22:11; सभोपदेशक 10:12; कुल 4:6)। सुनिश्चित करें कि उससे हमेशा दूसरों की उन्नति ही होती है (नीतिवचन 10:31; 31:26; इफि 4:29)। पूछने वालों को पक्का उत्तर देने के लिए सत्य को अच्छी तरह से सीख लें (नीतिवचन 22:17-21; 1 पतरस 3:15)। परमेश्वर को धन्य कहें और उसकी प्रशंसा करें (भजन 34:1-3)!
पास्टरों, सुनो, सब मनुष्यों में आपका मुंह जीवन का गहिरा सोता ठहरे, क्योंकि आप मनुष्य और परमेश्वर के बीच उस मेल-मिलाप का सुसमाचार सुनाते हैं जिसका एकमात्र मध्यस्थ प्रभु यीशु मसीह है। आपके पास विश्व में सबसे अधिक शांति देनेवाले, जीवनदाई और उन्नति के वचन होने चाहिए! लेकिन सुनिश्चित करें कि आप केवल परमेश्वर के वचन का प्रचार करते हैं, न कि उन दंतकथाओं और मन बहलानेवाली बातों का जिनकी आज सबसे अधिक खोज की जाती है (1 कुरिन्थ 2:1-5; 1 थिस्सु 2:13; 2 तीमु 3:14-17; 4:1-4)
प्रभु यीशु मसीह का मुँह किस प्रकार का था? उसका मुँह जल से भरा गहरा, बहुत ही गहरा सोता था जिसने आत्माओं को सदा के लिए तृप्त कर दिया (यूहन्ना 4:13-14; 6:63,68)। उसके वचन इतने अनुग्रहकारी थे कि उन्हें सुनकर आराधनालय के लोग अचम्भित हो जाते थे और सन्नाटा छा जाता था (भजन 45:2; लूका 4:20-22)। जब उसने पवित्र शास्त्र की बातें कहीं, तो सुननेवालों के मन आनन्द से फुट पड़े (लूका 24:32)। क्या ही शानदार उदाहरण है! यीशु और उसकी वाणी को आज ही अपना मार्गदर्शक बनने दें।
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