नीतिवचन 1:9

क्योंकि वे तेरे सिर पर अनुग्रह का आभूषण, और तेरे गले में सिकरें ठहरेंगे।

एक नवजवान सिर पर मुकुट और गले में सिकरें पहने हुए किसी वैभवशाली राजकुमार के समान बन सकता है। इसकी दो शर्तें हैं – पहली, ऐसे माता-पिता जो उसे परमेश्वर की बुद्धि सिखाए, और दूसरी, उस शिक्षा के प्रति उसकी अपनी आज्ञाकारिता। यदि इन दोनों में से कोई एक अपने कर्तव्य से चूक जाए, तो एक युवक, या युवती की परवरिश एक दुष्क्रियाशील और लज्जाजनक स्थिति में होगी। ऐसे मामले में एकमात्र उपाय है परमेश्वर का सामर्थी अनुग्रह, अन्य शिक्षकों का हस्तक्षेप, या फिर सफलता के लिए इस तरह की बाधा को दूर करने के लिए उस युवक, या युवती का अपना लगन से भरा परिश्रम।

यह नीतिवचन एक शक्तिशाली दृष्टांत है। एक उपमा को इंगित करने के लिए इस में “जैसा” या “के समान” शब्द का उपयोग करने के बजाय, सुलैमान ने यह शिक्षा देकर एक मजबूत मुद्दा प्रस्तुत किया कि माता-पिता के निर्देश का पालन करने से एक जवान को ऐसा सदृश्य सम्मान मिलेगा जो आम तौर पर किसी राजकुमार को दिया जाता है (उत्प. 41:42)। हालांकि आज्ञाकारिता से एक जवान को सार्वजनिक रूप से शाब्दिक आभूषण प्राप्त नहीं होगा, पर फिर भी इस से उसे वह अनुग्रह और बुद्धि प्राप्त होगी जो एक जवान को परमेश्वर और मनुष्य दोनों की दृष्टि में शानदार ढंग से बढ़ाएगी।

सुलैमान ने नीतिवचन की पुस्तक के उद्देश्य का परिचय दिया (नीति. 1:1-6), परमेश्वर का भय मानने में बुद्धि की नींव रखी (नीति. 1:7), और जवान का अपने माता-पिता की आज्ञा मानने के महत्व की पहचान कराई (नीति. 1:8-9)। उसने दुष्ट लोगों के साथ संगति रखने के खिलाफ चेतावनी दी (नीति. 1:10-19), और उसने उस ज्ञान को, जो वह दे रहा है, ठुकरा देने के भयावह परिणामों का वर्णन किया (नीति. 1:20-33)। यहाँ नीतिवचन की पुस्तक के पहले अध्याय में जीवन में सफलता पाने के नींव के पत्थर रखे गए हैं।

एक जवान को सफलता पाने के लिए माता-पिता की बुद्धिमानी से भरी शिक्षा आवश्यक होती है। इसके बिना, वह एक अज्ञानी शिशु के रूप में इस दुनिया में प्रवेश करता है, और जब तक कि माता-पिता का अनुभव और ज्ञान उसके दिल और दिमाग में भर नहीं दिए जाते तब तक वह उस शिशु अवस्था से आगे कुछ खास उन्नति नहीं कर पाता है। वह वास्तव में कभी बड़ा होता ही नहीं! वह अपने माता-पिता की लापरवाही के समतुल्य विकृत और अविकसित बना रहता है। वह ज्यादातर मामलों में एक बिगड़ैल बच्चे की तरह जीवन की ओर देखता और वैसा ही व्यवहार करता है। चरित्र की स्थापना बचपन और युवावस्था में ही होती है (नीति 19:18; 22:6,15)। उन बच्चों पर हाय जिनके माता-पिता मूर्ख, आलसी, लापरवाह, और दुष्ट हैं।

जवान अपने एक धर्मपरायण पिता को देखकर और उसकी आज्ञा का पालन करके जीवन में महत्वपूर्ण बातें सीखता है। वह अधिकार और प्रेम के बिच संतुलन बनाए रखना, विवाह को उच्च स्थान देना, अपने काम-धन्धे में सफलता प्राप्त करना, परिवार का नेतृत्व करना, अधिकारियों का सम्मान करना, धन का प्रबंधन करना, वेश्याओं और नशे से बचना, परमेश्वर के साथ चलना, प्रार्थना करना, बाइबल का व्यवहारिक उपयोग करना, और दूसरों के अपराधों को क्षमा करना सीखता है। इस प्रशिक्षण के बिना, उस में अनुग्रह, नम्रता, दृढ़ता, दया और अपनी आत्मा और जीभ पर काबू रखना इन जैसे सद्गुणों की कमी होती है। वह कभी भी परमेश्वर और मनुष्य के अनुमोदन से प्राप्त किसी मनुष्य का शाही अनुग्रह और गौरव प्राप्त नहीं कर पाता है।

अब तक आप ने कौन-कौन से सबक सीखे हैं? एक जवान की सफलता धर्मी माता-पिता की बुद्धि से युक्त शिक्षा पर निर्भर करती है। माता-पिता को परमेश्वर की ओर से यह दायित्व दिया गया है कि वे अपने बच्चों को परमेश्वर का भय मानना सिखाये (नीति 23:13-14; 29:15; व्यव. 6:4-7; इफि 6:4)। और बच्चे अपने माता-पिता को उस बड़ी दया और सेवा का प्रतिफल चुकाने के लिए उनके कर्ज़दार होते हैं जो उन पर उनकी असहाय दशा में दिखाई गई थी (1 तीमु: 5:4)।

लेकिन बुद्धिमान माता-पिता की शिक्षा इस संतुलन का केवल आधा हिस्सा है। एक जवान को अपने माता-पिता के प्रयासों से लाभ पाने के लिए अवश्य है कि वह उनके नियमों और चेतावनियों का पालन करे। एक मूर्ख और जिद्दी बच्चा असफलता और विपत्ति भोगने के लिए अभिशप्त होता है। उस के जीवन में जितने भी लोग हैं उन सभी के मध्य समृद्ध होने का एकमात्र मार्ग यह है कि वह अपने माता-पिता की सलाह पर ध्यान दे और अपने जीवन में उसका पालन करे (नीति 3:1-2; 4:10-13,20-22; 5:1 -2; 6:20-24; 7:1-5; 23:19-23; इफि. 6:1-3)। परमेश्वर और मनुष्यों के सामने राजकुमार बनने का लक्ष्य धर्मी माता-पिता की सावधानीपूर्वक आज्ञाकारिता से ही प्राप्त होता है।

हे पिताओ! क्या आप अपने बच्चों को दाऊद, इब्राहीम और अन्य भक्तिमान पुरुषों के समान प्रभु के पालन-पोषण और नसीहत में प्रशिक्षित कर रहे हैं (नीति 4:3-4; उत्प. 18:19; भजन 34:11; 78:1-8; इफि. 6:4)? आपकी बहानेबाजी चाहे जो भी हो, यदि आप अपने बच्चों की उपेक्षा करते है तो उसके नतीजे आपकी आनेवाली पीढ़ियों के लिए विपत्तियों को जन्म देंगे।

हे जवान! क्या तू अपने माता-पिता की उस शिक्षा का जो उन्होंने तुझे दी है, पालन कर रहा है? क्या तू विनम्र मन से उस शिक्षा को स्वीकार कर रहा है, भले ही वह इस विकृत संसार से अलग हो (नीति 15:31; व्यव. 4:5-10)? क्या तू बलवंत और एकचित्त है ताकि तू अपने मित्रों के दबाव और पापपूर्ण प्रभावों का विरोध कर सकें (1 कुरिं 15:33)?

हे पुरुषों, तुम जो सयाने हो चुके हो! यदि आपके माता-पिता महान थे जिन्होंने आपको प्रभु का भय मानना सिखाया, तो उनका सम्मान करें, और उनके लिए परमेश्वर को धन्यवाद दे। यदि आपके ऐसे माता-पिता नहीं थे, तो आपको परमेश्वर से मदद के लिए याचना करने की आवश्यकता है और उन मूल्यवान बातों को सीखने के लिए अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है जो आपको बचपन में नहीं सिखाई गई थीं।

अंतिम परम-मुकुट और महिमा के सिकरें स्वर्ग में उन लोगों के लिए रखे हुए हैं जो परीक्षाओं में टिके रहते हैं और धार्मिकता के जीवन का पीछा करते हैं जैसा कि यीशु मसीह और उसके चेलों ने परिभाषित किया (1 कुरि. 9:25; 2 तीम. 4:8; याकू. 1:12; 1 पत. 5:4; प्रका. 2:10)। स्वर्ग में का एक राजकुमार पृथ्वी पर के राजकुमार से असीम रूप से श्रेष्ठ है। अपनी चालचलन को लेकर चौकस रहे। अपने प्रतिफल को गवाँ न दो (2 यूह. 1:8)।

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