नीतिवचन 1:8
हे मेरे पुत्र, अपने पिता की शिक्षा को सुन, और अपनी माता की व्यवस्था को न त्याग।
हे बालकों! आपका भविष्य आपके माता-पिता की आज्ञा मानने पर निर्भर करता है। नीतिवचन का परिचय देने के बाद (नीति. 1:1-6), सुलैमान का दूसरा नीतिवचन बच्चों के लिए है कि वे माता-पिता की आज्ञा माने (नीति. 1:8-9)। पिता की शिक्षा और माता की व्यवस्था आपको समृद्ध बना सकती है (नीति. 6:20-23)। परन्तु अपने माता-पिता के प्रशिक्षण को ठुकराने का नतीजा यह होगा कि उससे कष्ट और संकट आएंगे और असामयिक मृत्यु होगी (नीति. 15:10; 23:13-14)।
इस नीतिवचन के पहले के नीतिवचन ने यहोवा के भय को ऊँचा उठाया (नीति. 1:7)। निःसंदेह, यह हर जीवित व्यक्ति के लिए बुनियाद है, अर्थात् अपने सृष्टिकर्ता को जानना और उसकी आज्ञाओं को मानना (नीति. 9:10; अय्य. 28:28; भजन. 111:10; 112:1; 128:1-6; सभो. 12:13-14)। परन्तु एक सफल जीवन के लिए बिल्कुल अगला नियम है माता-पिता की आज्ञाओं का पालन करना जिन्हें सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने पूरी मानव जाति में से विशेषकर आपके लिए चुना है (निर्ग. 20:12; इफि. 6:1-3)।
ऐसा नहीं कि हर पिता अच्छी ही शिक्षा दे; और न ही हर माँ धर्मपरायण व्यवस्था देती है। परन्तु सुलैमान और उसकी पत्नी बुद्धिमान थे। सुलैमान के माता-पिता महान थे, और वह चाहता था कि उसका पुत्र उसकी शिक्षा पर मन लगाए (नीति. 4:1-4)। यदि आपके माता-पिता मसीही हैं जो आपके लिए परमेश्वर से आनेवाली उत्तम बातों की अभिलाषा रखते हैं, तो उनकी पूरी तरह से आज्ञा मानने का हर कारण है। और यदि आपके माता-पिता मसीही नहीं हैं, तौभी परमेश्वर चाहता है कि आप तब भी उनकी आज्ञा का पालन करें।
परमेश्वर का भय मानने के बाद, बच्चों के लिए बुद्धिमान बनने और जीवन के संकटों से बचने का सबसे सरल तरीका है उस ज्ञान और स्नेह से युक्त बुद्धि का पालन करना जिसे आपके माता-पिता ने बड़ी मेहनत और अनुभव से अर्जित किया है। क्या ही अद्भुत बात है! परमेश्वर ने एक अनुभवी पुरुष और एक अनुभवी स्त्री को प्रत्येक बच्चे के लिए गहरे भावनात्मक बंधन से ओतप्रोत व्यक्तिगत अभिभावक के रूप में नियुक्त किया है। एक बच्चा कभी भी अपने पिता या माता की अवज्ञा भला क्यों करेगा?
लेकिन कई पिताओं ने शिकायत की है, “उसने ऐसा क्यों किया? मैंने उसे स्पष्ट रूप से उस समस्या से बचना सिखाया।” हालांकि ख़याल रखनेवाले और अनुभवी उस पिता ने अपने पुत्र को किसी विशिष्ट विकल्प के चुनाव के खतरे के विषय में चेतावनी दी थी, पर फिर भी पुत्र ने वह सलाह न तो सुनी और न ही उसे स्मरण रखा। वह उस सबक को समझ नहीं पाया और न उस सबक को अपने चित्त में रख पाया, और वह उसी तकलीफ और परेशानी में गिर पड़ा जिससे उसके पिता ने उसे बचाने की कोशिश की थी।
कई माताओं ने शिकायत की है, “मेरी बेटी ने ऐसा क्यों किया? मैंने उसे ऐसा कभी न करने का नियम दिया!” भले ही इस धर्मी और प्रेम करनेवाली माँ ने अपनी पुत्री की रक्षा के लिए एक व्यवस्था बनाई थी, पर फिर भी इस मूर्ख लड़की ने अपना रास्ता खुद चुना और कड़वे परिणामों की कटनी कीं। उसने अपनी माँ की विवेकपूर्ण चेतावनी की उपेक्षा करके उसकी व्यवस्था को त्याग दिया और इसके बजाय उसने अपने ही तरीके से काम करने का फैसला किया।
किस वजह से बच्चे इतने मूर्ख होते हैं? उनके पास ज्ञान और अनुभव का उतना ही अंश होता है, जितना कि उनके माता-पिता के पास होता है। वे अपने आस-पास के अस्तव्यस्त जीवन की प्रकृति और कारणों की पहचान या उनका विश्लेषण करने में असमर्थ होते हैं। उनके पास दूर तक देखने की दृष्टि नहीं होती है, और केवल वर्तमान के विषय में सोचते हैं, जबकि उनके माता-पिता भविष्य पर बल देते हैं। वे अपने समकालीन दबाव और बचकानी मूर्खता के द्वारा भावनात्मक रूप से बहक जाते हैं। उनके माता-पिता उन्हें किसी और से अधिक बेहतर रूप से जानते हैं, यहाँ तक कि उनसे भी बेहतर, फिर भी वे अपने तरीके से काम करने का हठ करते हैं। कितनी बड़ी बेवकूफी!
यह घमण्ड, विद्रोह और अपने आप को धोखा देने का पाप हैं। एक बच्चा, हालांकि शौचालय का उपयोग करने और एक कप से पीने के लिए मुश्किल से प्रशिक्षित हुआ होता है, उसका यह मानना होता है कि वह अपने माता-पिता से ज्यादा जानता है। वह लैन्गिक सम्बन्ध का अनुभव लेना चाहता है, हालांकि इससे पहले कि वह लैन्गिक सम्बन्ध की कल्पना भी कर सके, उसके माता-पिता कम से कम 10 साल तक हर रात एक साथ सो चुके होते हैं। कितना दुस्साहस! वह बचत करने के बजाय अपनी सारी कमाई खर्च करना चाहता है, भले ही उस ने अपने स्वयं की परवरिश के लिए एक रूपए का भी योगदान नहीं दिया हो।
क्या माता-पिता की आज्ञा मानना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि बाइबल कहती है? क्या अवज्ञा मृत्युदंड के योग्य है (नीति. 20:20; 30:17; व्यव. 21:18-21; 27:16)? बिल्कुल! भले ही माता-पिता की व्यवस्था का उल्लंघन करने से प्रत्यक्ष रूप से कई गंभीर परिणाम नहीं होते हैं, फिर भी परमेश्वर स्वयं अपने नियुक्त प्रतिनिधियों को मान्यता देने या उनकी पुष्टि करने, माता-पिता को शांति प्रदान करने, और बच्चे को उसके भविष्य की समृद्धि के लिए अधिकार से परिचित कराने के लिए सख्त आज्ञाकारिता की मांग करता है। परमेश्वर स्वयं विद्रोहियों का नाश करेगा।
बालक! तुझे अपने माता-पिता की आज्ञा न मानने के विरोध में चेतावनी दी गई है। लेकिन परमेश्वर ने एक प्रतिफल की भी प्रतिज्ञा की है, यदि तू उनकी बात मानेगा और उनका सम्मान करेगा। वह तुझे लम्बी आयु देगा और उस लम्बे जीवन को अच्छी सफलता से आशीषित करेगा (इफि. 6:1-3)। क्या तू अपने उज्वल भविष्य पर विश्वास कर सकता है? तेरे पास बुद्धि की बातें सीखने के लिए प्रेम करने वाले माता-पिता हैं, यदि तू विद्रोह करता है तो दंड की चेतावनी, किन्तु यदि तू आज्ञा मानता है तो अद्भुत आशिषें। सिर्फ आज्ञा मानने से ही तुझे शांति और सफलता के रास्ते में सब कुछ मिल सकता है।
हे पिताओं! क्या आप अपने बच्चों को वह निर्देश दे रहे हैं जो उन्हें जीवन में सफल होने और परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़ने के लिए आवश्यक है? आपके सृष्टिकर्ता ने आपको यह कर्तव्य दिया है (इफि. 6:4)। हे माताओं! क्या आप अपने बच्चों को इस विकृत पीढ़ी की भयानक मुसीबतों से बचाने उनके लिए निर्देशों की व्यवस्था बना रही हैं? आप अपने पति के साथ इस कर्तव्य को निभाने के लिए उतनी ही ज़िम्मेदार हैं (नीति. 6:20)। बच्चों की परवरिश में ही स्वयं को संतुष्ट न करें। सुनिश्चित करें कि आप उन्हें जीवन में परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए तैयार कर रही हो।
भले ही वर्तमान पीढ़ी सोचती है कि पिता और माता पुराने ज़माने के हो चुके हैं – जो बदले में एकल पालक के घरों, समलिंगिक विवाहो, टेस्ट ट्यूब क्लोनिंग और सार्वजनिक चिड़ियाघर के निर्देश पर ज़ोर देती है, फिर भी परमेश्वर का वचन अब भी आपके सृष्टिकर्ता की ओर से सदैव प्रासंगिक और असीम रूप से बुद्धिमान नियमावली के रूप में बना रहता है (भजन. 119:128; यशा. 8:20; 1 तिमु. 6:20-21)। उसकी व्यवस्था से कोई भी समझौता करने, उसका तिरस्कार करने या उलट देने का कोई भी प्रयास भ्रम और विनाश ही को ले आएगा (नीति. 29:18; भजन. 9:17)।
प्रिय पाठक! क्या आपने अपने आप को स्वर्ग में निवास करनेवाले अपने पिता की शिक्षा और व्यवस्था के अधीन कर दिया है? यदि आप उसके वचन के शिक्षा की उपेक्षा करते हैं, तो आपकी प्रार्थनाएँ भी उसके लिए घृणित बन जाती हैं (नीति. 28:9)। यदि आप एक तत्पर और एकचित्त श्रोता नहीं हैं, तो वह आप से ऐसी किसी भी बुद्धि को भी छीन लेगा जो आपको लगता है कि आपके पास है (लूका 8:18)। जिस सत्य का प्रचार किया जाता है उसे सुनने की आशिष और प्रतिफल केवल उनके लिए है जो सुनी हुई बातों का पालन करते हैं (भजन 19:11; याकूब 1:21-25)।
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