नीतिवचन 1:7
यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, परन्तु मूर्ख लोग बुद्धि और शिक्षा की निन्दा करते हैं।
यह एक गम्भीर नीतिवचन है, क्योंकि यहोवा का भय माने बिना शेष सभी नीतिवचन व्यर्थ हो जाते हैं। सुलैमान ने इसे प्रथम स्थान पर रखा! परमेश्वर का भय मानना विद्या पाने की मौलिक बुनियाद है (नीति 9:10), परन्तु मूर्ख ज्ञान और शिक्षा को ठुकराते हैं, क्योंकि वे घमंडी और स्वार्थी होते हैं और परमेश्वर का कोई लिहाज़ नहीं करते। उन्हें अपनी ही मान्यताएं अच्छी लगती हैं (नीति. 26:12)। सत्य की खोज करने के बजाय, मूर्ख केवल अपने ही मन की बातों को बढ़ावा देना चाहते हैं (नीति. 18:1-2)। आप परमेश्वर का सच्चा भय माने बिना विद्या को पाना आरम्भ भी नहीं कर सकते।
यहोवा कौन है? वह बाइबल का यहोवा है, अर्थात् महान “मैं जो हूं सो हूं” (निर्ग. 3:14; 6:3)। उसने चौबीस घंटे के छः दिनों में आकाश, पृथ्वी, समुद्र और उन में जो कुछ है वह सब बनाया। जब वह 2000 वर्ष पहले एक मनुष्य के रूप में आया, तो उसका नाम यीशु रखा गया (यशा. 7:14; 9:6; मत्ती 1:21-23; यूह. 1:1, 14)। यीशु मसीह यहोवा है! वह शीघ्र ही धधकती आग में से होकर अपने सामर्थी स्वर्गदूतों के साथ अपने शत्रुओं और इस जगत का नाश करने के लिए आ रहा है (2 थिस्स. 1:7-11; 1 तिमु. 6:13-16)।
परमेश्वर का भय उसके लिए एक स्नेह से युक्त श्रद्धा और उसके वचन के प्रति विनम्र समर्पण है। परमेश्वर का भय मानना उसकी आज्ञाओं से प्रेम रखना और बुराई से घृणा करना है (नीति. 8:13; 16:6; भजन. 111:10; 112:1)। परमेश्वर का भय मानने का अर्थ है उसे होनेवाली सभी बातों के प्रथम कर्ता और अंतिम निर्णायक के रूप में पहचानना (नीति. 16:4; प्रका. 4:11)। परमेश्वर का भय उसकी क्षमा को जानता है और उसे प्रसन्न करने की खोज में रहता है (भजन 130:3-4)। परमेश्वर का भय मानने वाला मनुष्य उसके वचन के सम्मुख विनम्रता से कांपता और थरथराता है (यशा. 66:2)। मनुष्य का सम्पूर्ण कर्तव्य यही है (सभो. 12:13-14)।
शारीरिक स्वभाव के मनुष्य, जो परमेश्वर का भय नहीं मानते, मूर्ख होते हैं (भजन 14:1; 36:1; 58:1)। तर्क करने की उनकी नीति विकृत है, क्योंकि वे अपने स्वयं के अहंकारी विचारों से उत्पन्न एक चक्र में तर्क करते हैं (रोमि. 1:20-23; 1 तीमु. 6:3-5,20-21)। इसके विपरीत आत्मिक मनुष्य, जो परमेश्वर का भय मानते हैं, बुद्धिमान और विवेकपूर्ण होते हैं, क्योंकि उनके विचारों का आरम्भ सृष्टिकर्ता परमेश्वर में विश्वास के साथ होता हैं (2 थिस्स. 3:2; इब्रा. 11:3, 6)। मूर्ख अपनी सोच का आरम्भ अन्य मूर्खों के विचारों से करता है, तो वही एक विश्वासी परमेश्वर के वचनों से।
सभी लोग एक चक्र के भीतर तर्क करते हैं, या पहले से ही विद्यमान मान्यताओं से आरम्भ करते हैं। उनका ज्ञान और उनकी बुद्धि उनकी कल्पित मान्यताओं पर निर्भर करती है। परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाला व्यक्ति इस पूर्व-धारणा से आरम्भ करता है कि उसके तथा उसके पहले के मूर्ख विद्वानों के विचार बुद्धिमानिपूर्ण और तर्कसंगत हैं। वह इस पूर्वधारणा से आरम्भ करता है कि जब वह डायपर पहनता था तब से लेकर बीस वर्ष का होने तक उसने बहुत प्रगति की है। इसके विपरीत, एक धर्मी व्यक्ति एक असीम बुद्धिमान परमेश्वर में, जिसने पवित्रशास्त्र में सत्य और ज्ञान को प्रकट किया है, विश्वास करने से आरम्भ करता है, । वह यह सोचकर आरम्भ करता है कि वह कुछ भी नहीं जानता है और उसे किसी और की मदद की जरूरत है।
मूर्ख अपने सिद्धांतों को प्रमाणित नहीं कर सकता। वह क्रमिक-विकास (evolution) जैसे मतिभ्रम को विज्ञान कहता है, लेकिन उसने कभी भी क्रमिक-विकास को अपनी आखों से नहीं देखा है, न प्रयोगशाला में इसका प्रतिरूप दोहराया है, और न ही इसे पर्याप्त रूप से परिभाषित किया है। वह मूर्ख है! और उसका तथाकथित विज्ञान केवल एक कल्पित कहानी है (1 तीमु. 6:20-21)। विश्वासी जानता है कि बाइबल आंतरिक और बाह्य दोनों ही रूप से पूरी तरह से सत्य है, लेकिन वह इसे मूर्ख को प्रमाणित नहीं कर सकता और न ही करेगा, क्योंकि मूर्ख में आवश्यक कारक नहीं होता है, अर्थात् – विश्वास (2 थिस्स. 3:1-2)।
विश्वास पर बारीकी से विचार करें। मूर्ख को अपने आप में और अपने अन्य संगी मूर्खों में विश्वास -आस्था और भरोसा- होता है। मनुष्य एक बुद्धिमान सृष्टिकर्ता से आया है यह मानने के लिए जितने विश्वास की आवश्यकता होती है उससे अधिक विश्वास यह मानने के लिए आवश्यक होता है कि मनुष्य तरह तरह की विभिन्न अराजक गैसों और बन्दरों से आया है। मूर्ख भी विश्वास करता है, किन्तु उसका यह विश्वास मनुष्य के मतिभ्रम में विश्वास है। मूर्ख झूठी बातों पर विश्वास करता है, जो कि स्वयं को धोखा देना है। विश्वास करनेवाला मनुष्य परमेश्वर और उसके वचन पर विश्वास रखता है (इब्रा. 11:1-6), जो आत्म-शिक्षा है (नीति. 15:33)।
मनुष्य की उत्पत्ति कैसे हुई? मूर्ख का कहना है कि अराजक गैसों के एक महा-विस्फोट ने व्यवस्थाक्रम, रचना, सुन्दरता, जीवन, और उन्हें फिर से उत्पन्न करने और संरक्षित करने की क्षमता और नियमों को स्थापित किया। जो व्यक्ति परमेश्वर का भय मानता है वह जानता है कि मूर्ख एक मूर्ख है, क्योंकि केवल एक मूर्ख ही ऐसी बेतुकी कल्पना कर सकता है, और केवल मानसिक रूप से विक्षिप मनुष्य ही ऐसा कहेगा। परन्तु परमेश्वर पर भरोसा रखने वाला एक विनम्र व्यक्ति एक मासूम बच्चे के सामान चिल्लाकर कह उठता है, “सम्राट तो नंगा है!” वह जानता है कि परमेश्वर ने मनुष्य को मिट्टी से बनाया और उस में जीवन की सांस फूंकी।
क्रमिक-विकास का सिद्धांत परमेश्वर से घृणा करनेवाले और पाप से प्रेम रखनेवाले मन की सोच का परिणाम है, जिसे शैतान के अधीन कर दिया गया है और यह स्वयं परमेश्वर ही है जो इन मूर्खों को बन्दरों की आराधना उनके पूर्वजों के रूप में करने के लिए अंधा कर देता है (यशा. 44:9-20; रोमि. 1:20-23)। उनके “विचार-मंच” आज भ्रामक तत्वों का धुँआ उड़ाने के लिए हैं ताकि यह देखें कि किसी चीज़ के लिए सबसे विचित्र स्पष्टिकरण देकर कौन आज सफल होता है। क्या आपको इस आरोप पर संदेह है? आपको क्या लगता है कि वे क्यों कहते हैं कि अंतरिक्ष में 14 अरब वर्षों पहले बड़ा धमाका हुआ था जिसके बाद जीवन और सृष्टि अस्तित्व में आएं? वे तो यह भी नहीं जानते कि 4 हज़ार वर्षों पहले मनुष्य पृथ्वी पर क्या कर रहे थे!
परमेश्वर, जो धन्य है, वह उन लोगों को अंधा कर देता है जो इस बात के लिए परमेश्वर को धन्यवाद नहीं देते हैं जो वे हैं और जो उनके पास है (रोमि. 1:20-23)। जब वे सृष्टिकर्ता की तुलना में सृजी हुई वस्तुओं को अधिक महिमा देते हैं, तब वह उन्हें पुरुषगामीता, गर्भपात, बच्चों का विद्रोह, अश्लीलता, और समलैंगिक विवाह जैसे अत्यंत लज्जाजनक काम करने के लिए विनाशकारी मनों के अधीन कर देता है (रोमि. 1:24-32) । यहोवा प्रभु परमेश्वर ने ऐसे लोगों का नाश करने के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध किया है (1 कुरि. 1:19-20; 3:19-20)।
सात दिवसीय सप्ताह की उत्पत्ति कैसे हुई? क्या किसी पुरातनपन्थी व्यक्ति ने फैसला किया कि वह छह दिन काम करने के बाद थक गया था और इसलिए उसे सातवें दिन विश्राम की ज़रूरत थी? सूर्य की गतियाँ ऋतुओं और वर्षों और दिनों की शिक्षा देती हैं, और चन्द्रमा महीनों की शिक्षा देता है, बिलकुल वैसा ही जैसा कि परमेश्वर ने घोषित किया था (उत्प. 1:14-19)। सप्ताह की उत्पत्ति कहाँ से हुई? परमेश्वर के प्रकाशन से (उत्प. 2:1-3; निर्ग 20:8-11)!
नैतिकता की उत्पत्ति कैसे हुई? क्या व्यभिचार ग़लत है? यदि नहीं, तो बहुविवाह ग़लत क्यों है? यदि नहीं, तो वेश्यावृत्ति ग़लत क्यों है? यदि नहीं तो अश्लील साहित्य (अर्थात् पोर्नोग्राफी) ग़लत क्यों है? यदि नहीं, तो पशु-गमन ग़लत क्यों है? यदि नहीं, तो बाल यौन-शोषण ग़लत क्यों है? हे मूर्ख तू कैसे तर्क करता है? क्या तेरी परिकल्पनाओं से जन्मा एक असभ्य गुहावासी मनुष्य स्त्री की रक्षा करना चाहता था और उसे दो वयस्कों के मध्य स्थापित होनेवाले एक-पत्नीक संबंध में एक प्रेमपूर्ण और सुरक्षित जीवन देना चाहता था? या फिर यह धन्य परमेश्वर ही है जिसने विवाह को स्थापित किया?
एक क्रमिक-विकासवादी कैसे तर्क करता है इस पर गौर करें। एक ओर तो वह यौन संयम और कौमार्य पर हंसता है, जबकि दूसरी ओर वह किसी स्त्री का गर्भपात करते समय गर्भपात के एक चूषण यन्त्र या कैंची के ज़रिये अत्यंत छोटे शिशुओं को अंग अंग करके बाहर निकालता है। जहाँ एक ओर वह लगातार भोजन, पानी और जीवनसत्वों की आपूर्ति के साथ सुरक्षित पिंजरों में मुर्गियों को कैद रखने के लिए किसानों पर मुकदमा करता है, लेकिन वही दूसरी ओर वह एक अजन्मे बच्चे को टुकड़े-टुकड़े करके गर्भपात करने के तथाकथित अधिकार का शातिर रूप से बचाव करता है। और वे इसे ज्ञान कहते हैं!
परमेश्वर का भय मानना ज्ञान का आरम्भ है – धर्म का ज्ञान। यदि परमेश्वर और उसकी बाइबल नहीं होती, तब भी पुरुष अपनी मूर्तियों के साथ शांति स्थापित करने के लिए अपनी पत्नियों और बच्चों की बलि दे रहे होते, जैसा कि हमारे भारत जैसे देशों में आज भी किया जाता है। वे अब भी सुखविलास की खोज में जाने के लिए महान आत्मा के साथ शांति बनाने के लिए अपने शरीर को कटते और गोंद रहे होते।
परमेश्वर का भय मानना ज्ञान का आरम्भ है – सरकार का ज्ञान। यदि परमेश्वर और उसकी बाइबल नहीं होती, तब भी लोग अपने सम्राट या राजा को परमेश्वर के रूप में पूजते, जैसे पुराने मिस्रवासी और बीते कल के जापानी करते थे। परोपकारी सरकार को बाइबल में स्थापित किया गया था, और इसका केवल उन राष्ट्रों में व्यापक रूप से आनन्द लिया जाता है जो बाइबल प्रचार के लिए आश्रय स्थल रहे हैं। अन्य सभी देशों में, देहातियों का उपयोग शासक की विलासिता की भूख को संतुष्ट करने के लिए किया जाता है।
परमेश्वर का भय मानना ज्ञान का आरम्भ है – इतिहास का ज्ञान। आज अधिकांश इतिहासकार अपनी किसी सामाजिक योजना को आगे बढ़ाने के लिए इतिहास लिखते हैं, और वे जो ईमानदारी से लिखते हैं उनके पास वैसे भी बहुत कम जानकारी होती है। जैसे ही मूर्ख व्यक्ति जान लेता है कि प्राचीन सभ्यताओं के विषय में बाइबल के वृत्तांत सत्य हैं, तब ये ही लोग स्कूलों में बाइबल को अवैध ठहराते हैं, कहीं ऐसा न हो कि बच्चें सत्य के ज्ञान तक पहुंचे। हाल ही के हित्तियों की खोज पर ध्यान दें जिनका वर्णन बाइबल में 3,000 वर्षों से किया जा रहा है।
बाइबल में विश्व की उत्पत्ति से लेकर आपके मूर्ख बच्चे के साथ क्या करना है, मृत्यु की उत्पत्ति से लेकर उसके समाधान तक, विवाह के सही नियमों से लेकर दुष्टों की शाश्वत अवस्था तक सभी प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। परमेश्वर का भय मानने का अर्थ है कि आप उसके वचन पर विश्वास करते हैं, और उस पर भरोसा करते हैं, जो आपको आपके जीवन के सभी प्रश्नों की अंतर्दृष्टि और उनका उत्तर देता है, जबकि क्रमिक-विकासवादी मूर्ख व्यक्ति केवल महा-विस्फोट के युग के नए अनुमानों के विषय में तर्क-वितर्क करता रह सकता है।
परमेश्वर का भय मानने का अर्थ है कि आप मनुष्य से नहीं डरते, जो समझौता करने के लिए दबाव लाता है (नीति. 29:25; यिर्म. 1:8, 17)। आपके पेशेवर जीवन क्षेत्र में प्राथमिक विद्यालय के छात्रों या शिक्षाविदों का सामंत दबाव लोगों को पारंपरिक विचारों या राजनीतिक रूप से सही लगनेवाले सिद्धांतों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है। यह फिर एक समय है जब बच्चा पुकार उठता है, “सम्राट तो नंगा है!” परमेश्वर का भय मनुष्य को इस बंधन से छुड़ाता है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति मानवीय अभिमतों को तुच्छ जानता है (भजन 119:98-100, 128)।
बुद्धि का मूल कहाँ है? प्रभु के भय में! परमेश्वर मनुष्यों की आखें, कान और हृदय को खोलता है कि वे सत्य और बुद्धि को जाने (1 राजा 3:5-15; याकूब 1:5)। परमेश्वर उनकी आंखें खोलता है ताकि वे उस के वचन को समझे (भजन 119:18)। परमेश्वर उन्हें अपनी गुप्त बातें दिखाता है (नीति. 3:32; भजन. 25:14)। वे किसी मनुष्य से नहीं डरते (इब्रा. 13:6)। बुद्धि विश्व में कहीं भी नहीं पायी जा सकती, बल्कि केवल परमेश्वर का भय मानने में पायी जाती है (अय्य. 28:12-28)।
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