नीतिवचन 1:5
बुद्धिमान सुनकर अपनी विद्या बढ़ाएगा; और समझवाला बुद्धि की मंत्रणा प्राप्त करेगा;
सुलैमान ने नीतिवचन की पुस्तक उन के लिए लिखी जो युवा और भोले-भाले हैं (नीति 1:4)। परन्तु उसने यह उन के लिए भी लिखी जो सयाने और बुद्धिमान हैं, ताकि वे इस पुस्तक के वचनों को समझने और उनका व्यवहारिक उपयोग करने के लिए अधिक शिक्षा प्राप्त कर सकें (नीति 1:5)। इसलिए, बुद्धि की मंत्रणा प्राप्त करने के लिए इन नीतिवचनों और उनकी व्याख्याओं का अध्ययन करना बड़ा ही मूल्यवान है। यदि आप बुद्धिमान बनना चाहते हैं, तो यहाँ वह मार्ग है!
नीतिवचन बुद्धिमानों की रहस्यमय गुप्त बातें हैं, और उनकी व्याख्या किए जाने की आवश्यकता होती है (नीति 1:6)। परन्तु यह परिश्रमपूर्ण प्रयास के योग्य है, क्योंकि परिश्रम से किए गए इनके अध्ययन का प्रतिफल यह है कि शिक्षा पानेवाला और भी अधिक शिक्षा और बुद्धि की मंत्रणा को प्राप्त करता है। इस पुस्तक में सुलैमान के नीतिवचन और उनकी व्याख्याओं को समझने और बुद्धिमानों के वचनों और उनकी रहस्यमय गुप्त बातों को सीखने से, आप बुद्धि की मंत्रणा प्राप्त करेंगे। जटिल मामलों में मदद के लिए लोग आपके पास आएंगे, क्योंकि आपने बुद्धि और समझ हासिल कर ली होगी। कितनी सम्मानजनक बात है!
विद्या को बढ़ाने और बुद्धि की मंत्रणा को प्राप्त करने का क्या नियम है? वह नियम है: सुनना! यहाँ तक कि बुद्धिमान और समझदार लोगों को भी सोचना और बोलना रोक देना आवश्यक है ताकि वे और भी अधिक बुद्धिमान बनने के लिए सुन सकें। आपकी उम्र या ज्ञान कोई मायने नहीं रखता। अधिक विद्या पाने और बुद्धिमानों की मंत्रणा को प्राप्त करने के लिए, अवश्य है कि आप दूसरों से भी शिक्षा की बातें सुने। आप नीतिवचन के इस ईश्वर-प्रेरित संग्रह की उपस्थिति में अपने आप को नम्र करें और विद्या तथा बुद्धि की मंत्रणा प्राप्त करें। क्या आप ऐसा करेंगे? चुनाव आपका है।
बुद्धि कानों से प्राप्त होती है, मुंह से नहीं। आपके दो कान हैं, किन्तु मुंह एक ही है। अत: अवश्य है कि आप सुनने में तत्पर और बोलने में धीमे हो (याकूब 1:19)। पर फिर भी, मूर्ख व्यक्ति को बोलना ज्यादा अच्छा लगता है, क्योंकि वह दूसरों को अपनी बुद्धि और अपना ज्ञान दिखाना चाहता है। परन्तु बुद्धिमान अपना मुंह बन्द रखते हुए अपने कान खोलेगा, कि वह अपने शिक्षकों की शिक्षा सुनकर उनकी बुद्धि और ज्ञान प्राप्त कर सके।
जवान और भोले लोगों को सुनने में इसलिए कठिनाई होती है, क्योंकि वे मूर्ख और उतावले होते हैं। बच्चे यह सोचकर अपने आप को धोखा देते हैं कि वे अपने माता-पिता से ज्यादा जानते हैं। कोई अनुभव या समझ न होने के बावजूद भी वे अपने बड़ों को ज्ञान सिखाना चाहते हैं। परन्तु वृद्ध लोगों को भी सुनने में समस्या होती है, क्योंकि वे अपने अनुभव को बहुत अधिक महत्व देते हैं। नीतिवचन की इस पुस्तक का केवल एक त्वरित सर्वेक्षण, या लोगों के मध्य मौजूद समस्याओं की एक छोटी समीक्षा ही एक व्यापक अज्ञानता को प्रकट करती है।
महान लोग समय को समझते हैं और उन्हें पता होता है कि किसी विशिष्ट समय पर क्या किया जाना चाहिए (1 इति. 12:32)। वे बदलती परिस्थितियों को परखते हैं और उनका सामना इस प्रकार करते हैं जिससे परमेश्वर और मनुष्य दोनों ही प्रसन्न हो। प्रश्न यह है कि वे जन्म से ही विरासत में मिली भ्रमपूर्ण और अज्ञानता की स्थिति से इस बुद्धिमानी प्रतिष्ठित स्थिति में कैसे पहुंचाते हैं? वे अपने प्राथमिक शिक्षकों अर्थात् अपने माता-पिता और पास्टरों से सुनते और उनसे सीखते हैं।
हमारे धन्य परमेश्वर ने बाइबल को लिखने प्रेरित किया, जो जीवन और अनंतकाल के लिए बुद्धि की बातों से भरपूर है। और उसने आपको माता-पिता भी दिए और पास्टरों को भी भेजा कि वे इच्छुक और समर्पित श्रोताओं को बाइबल की बातों की शिक्षा दें (व्यव. 6:4-9; इफि. 6:4; मला. 2:7; इफि. 4:11-14)। यदि कुछ बाकी है तो वह है आपकी भूमिका! जिस प्रकार इस्राएल ने एज्रा की, कुरनेलियुस ने पतरस की, और कुलीन बिरियावासियों ने पौलुस की सुनी, क्या आप भी वैसा ही कान लगाकर सुनेंगे (नहे. 8:1-12; प्रेरितों 10:33; 17:11)? चुनाव आपको करना है।
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