नीतिवचन 1:31

सो वे अपनी ही चाल का फल खाएंगे, और अपनी ही युक्तियों से उकता जाएंगे।

इस संसार को वही मिल रहा है जो वह चाहता था – ज्यादातर देश, परिवार और व्यक्ति अपने मूर्खतापूर्ण चुनावों के दर्दभरे नतीजों को भुगत रहे हैं। इसका स्पष्टीकरण एकदम सरल है। जब मनुष्य परमेश्वर से और उस बुद्धि और ज्ञान से जिसे वह उनके सामने सफल जीवन के लिए रखता है, अपना मुंह मोड़ लेते हैं, तब वह उन्हें उनकी मूर्खता पर और उस कारण उभरने वाले भयावह नतीजों पर छोड़ देता है (नीति 1:29-30)।

हमारे मूल पिता आदम ने परमेश्वर और जीवन से बढ़कर हव्वा और मृत्यु को चुना, और तब से सभी मनुष्य रोग और मृत्यु को सहते आ रहे हैं (रोमियों 5:12-14)। परमेश्वर ने आदम को चिताया था, परन्तु उस ने हव्वा और मृत्यु को चुना (उत्पत्ति 2:17)। सुलैमान ने इन नीतिवचनों के द्वारा बुद्धि के धन्य जीवन, और मूर्खता के शापित जीवन के विषय में स्पष्ट रूप से और बार-बार चिताया, परन्तु ज्यादातर लोग उसकी चेतावनी की उपेक्षा करते हैं।

जो लोग समाजशास्त्र में मास्टर डिग्री कर चुके हैं वे मानव जीवन के उन क्षेत्रों की पहचान करें जहां मनुष्यों ने परमेश्वर की बुद्धि को जघन्य रूप से ठुकरा दिया है, और इससे उभरे दर्दनाक नतीजों को समझे। या जीवन के उन क्षेत्रों की पहचान करें जहाँ मानवजाति सबसे अधिक पीड़ित है, और जहाँ उसने अपने सृष्टिकर्ता को तुच्छ जाना उस जड़ को ख़ोज निकाले। आप मनुष्य के दुर्व्यवहार और पीड़ा के कारणों तथा उनकी प्रकृति को जान लेंगे। मनुष्य को परमेश्वर और बुद्धि में कोई रूचि नहीं है, इस कारण वह उन्हें एक दूसरे के हाल पर और अधर्म पर छोड़ देता है कि वे आपस में एक दुसरे के साथ अशुद्ध काम करें। सभी मानवीय पीड़ाएँ अपने सृष्टिकर्ता की बाइबल में स्पष्ट रूप से प्रकट की गई बुद्धि को ठुकराने का सीधा नतीजा है।

पौलुस ने रोम 1:18-32 में इस मानव-विपत्ति को अत्यंत स्पष्ट रूप से समझाया, “21क्योंकि, यद्यपि वे परमेश्वर को जानते थे, फिर भी उन्होंने उसे न तो परमेश्वर के उपयुक्त सम्मान, और न ही धन्यवाद दिया; वरन् वे अनर्थ कल्पनाएं करने लगे – 24इसलिए परमेश्वर ने उन्हें उनके मन की वासनाओं की अशुद्धता के लिए छोड़ दिया – 26इस कारण परमेश्वर ने उन्हें नीच कामनाओं के वश में छोड़ दिया– तब परमेश्वर ने भी उन्हें उनके भ्रष्ट मन के वश में छोड़ दिया, कि वे अनुचित कार्य करें।”

आज, संसार भर में पुरुष और स्त्रियां परमेश्वर, बाइबल और किसी भी नैतिक संयम का तिरस्कार करते हैं। वे बाइबल के उपदेश का उपहास करते हैं और वे एक वास्तविक संयमी धर्म के साथ एक बीते समय की लुप्त हो रही दंतकथा के रूप में व्यवहार करते हैं। वे सार्वजनिक स्थानों पर धर्मोपदेश को अवैध और ग़ैर-कानूनी मानते हैं। स्कूलों में प्रार्थना पर प्रतिबन्ध लगाया गया है। अधर्मियों की जयंतियां मनाई जाती है, और महापुरुषों पर निन्दात्मक टीकाएँ की जाती हैं। इस संसार की दुष्क्रियात्मक दुर्दशा को देखना आसान है, और इसे ठीक करना भी उतना ही आसान हो सकता है। बस! आवश्यकता है तो केवल बाइबल से खरी धर्मशिक्षा की।

मसीही माता-पिता और शिक्षक अनाज्ञाकारी, अपमान करने वाले, सीखने में नालायक, अनियंत्रित, और हिंसक बच्चों पर चिढ़ जाते हैं। कई मसीही माता-पिता अपने बच्चों पर शर्मिंदा होते हैं, जिन्हें उन्होंने सब कुछ दिया। ऐसा क्या हुआ? इस समस्या की पहचान करना मुश्किल नहीं है। ये ग़ैर-बाइबलिय, अविश्वासी, नास्तिक और अधर्मी शिक्षकों द्वारा शिक्षित पीढ़ियाँ हैं – पहली मसीही पीढ़ी आम रूप से बाइबल की इस बुद्धि और खरी शिक्षा को ठुकरा देती है कि बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए उन्हें अनुशासन और दंड की आवश्यकता है (नीति 19:18; 29:15; 30:17)।

विवाहित पुरुष दबाव में हैं, वे अतिरिक्त काम, शौक, या व्यभिचार में शांति और राहत की ख़ोज करते हैं। अविवाहित युवक विवाह नहीं करना चाहते, क्योंकि उन्होंने किसी अत्याचारी स्त्री को अपने पति पर अत्याचार करते और पति को बड़ी पीड़ा सहते देखा है (नीति 30:21-23)। औरतों में यह अत्याचारी गुण कहाँ से आया? इसका जवाब आपको फेमिनिज़म अर्थात् स्त्रीवाद संगठनों द्वारा चलाए जाने वाले आन्दोलनों में मिलेगा जिनके परिणामस्वरुप स्त्रियों ने अपने-अपने पति के प्रति निष्ठा और उसकी अधीनता को ठुकरा दिया है (यशा 3:12; इफि 5:33; कुलु 3:18)।

बच्चों का यौन शोषण किया जाता है, यहां तक कि फिल्मों में भी। माएँ हाथ मलती हैं और सोच में पड़ती हैं कि ऐसा क्यों हुआ। एक बार जब यौन स्वतंत्रता का मार्ग चुन लिया जाता है, तो उस देश को नरक में जाने से कौन रोकेगा? बाइबल ने बुद्धिमानी से शिक्षा दी कि प्रेम और यौन-सम्बंध केवल विवाह में बंधे दम्पत्ति के लिए ही है (नीति 5:19; 6:25; 1 कुरिं 7:2-5; इब्रा 13:4)।

आज के युवा बंदरों की नाई भटकते-फिरते हैं, अपने शरीर के हर अंग को छेदकर बालियां पहनते हैं, पूरे शरीर पर टैटू गुदवाकर खुद को जंगलियों के समान रंगते हैं, फैशन के नाम से यहां-वहां फटी हुई जींस पहनते हैं, अजीबो-ग़रीब अंग्रेजी में बोलते हैं, खूंटो जैसी नुकीली हेयर-स्टाइल बनाते हैं, खुद को मंदबुद्धि बनाते हैं। स्कूल और कॉलेज शिक्षा के लिए अधिक धन की मांग करते हैं। क्या आप भूल गए हैं कि ये स्कूल्स ही जो बच्चों को बताती हैं कि वे बंदरों से आए हैं? राजनेता चुनावों से पहले महंगाई को कम करने और असंख्य नौकरियां देने का वादा करते हैं यदि मतदाता उन्हें चुनाव में जिताएं।

मजदूर संघ हड़ताल करते हैं। ज़रूरत की वस्तुओं की किमते आसमान छु रही हैं। बिना चर्चा के कानून पारित किए जाते हैं। फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं। व्यापार घाटा अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ गया है। इसे कैसे रोका जाए?

नशीले पदार्थ, नशीले पदार्थ और अधिक नशीले पदार्थ की मांग है! नशे के कारोबार की समस्या के लिए इस संसार के पास क्या समाधान है? कॉलेज के युवकों और युवतियों द्वारा शराब और नशे के खुलेआम सेवन के विषय में क्या! सुलैमान ने युवकों में पियक्कड़पन और पेटूपन और उसके परिणामों की निंदा की (नीति 20:1; 23:21, 29-35)। परन्तु मसीही युवाओं में विश्वविद्यालय की किसी डिग्री को पाने पर दिल खोलकर पार्टी में आनंद मनाया जाता है, और उसी समय बाइबल की शिक्षा को एक बीते समय की दंतकथा कहकर खारिज कर दिया जाता है! विश्वविद्यालय किसी भी देश के नैतिक-चरित्र को नष्ट करने वाले मुख्य साधनों में से एक हैं।

लोगों द्वारा क्रेडिट कार्ड पर लिया कर्ज रिकॉर्ड ऊंचाई पर है। व्यक्तिगत दिवालियापन बढ़ता जा रहा है। मकान मामूली डाउनपेमेंट देकर भारी ब्याजदर पर खरीदे जाते हैं। फिर भी मूर्ख लोग उधारी पर और भी अधिक खरीदारी करते जाते हैं! क्यों? क्योंकि मसीही युवक और युवतियों ने अपना अर्थशात्र नीतिवचन की पुस्तक के बजाय इस संसार के अधर्मी, बाइबल-विरोधी अर्थशात्रियों से सीखा है। सुलैमान ने बड़ी बुद्धिमानी से आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया की निंदा की है और बचत तथा निवेश के मूल्य को ऊंचा उठाया है (नीति 6:6-8; 14:4, 23; 21:17, 20; 28:19; 30:25)।

दो पुरुष एक दुसरे का हाथ पकड़कर मुस्कुराते हुए विवाह मंडप में या कोर्ट में आते हैं, विवाह की विधि पूरी करते हैं, और अशुद्ध कार्य के लिए हनीमून पर निकल जाते हैं। लेकिन बैल और घोड़े का क्या मेल! उसी प्रकार, दो स्त्रियाँ एक दुसरे का हाथ पकड़कर विवाह मंडप में या कोर्ट में जाती हैं, आपस में विवाह करती हैं, और एक दुसरे के साथ दुष्कर्म का काम करने एक-साथ रहने लगती हैं। परन्तु शेरनी और बकरी का क्या मेल! और इस से भी बद्तर, ये दोनों आपस में विवाहित पुरुष, और आपस में विवाहित स्त्रियाँ किसी बच्चे को गोद लेकर अपना परिवार शुरू करते हैं। फिर भी सरकार मुस्कुराती है, इन के लिए कानून बनाती है, इन का समर्थन करती है, रक्षा करती है, और किसी भी विपरीत राय की नफ़रत फैलानेवाले किसी अपराध के रूप में निंदा करती है।

समलैंगिकता कोई यौन या सामाजिक रहस्य नहीं है जिसे समझना कठिन हो – क्योंकि यह परमेश्वर ही है जिस ने उन के मनों को, जो उसका इन्कार करते हैं, उस ओर घुमा दिया, और इइस कारण वे यौनाचार को लेकर जंगली पशुओं से भी अधिक भ्रमित हैं (रोम 1:24-27)। जब मानवजाति परमेश्वर और उसकी बुद्धि से मुंह मोड़ लेती है, तब वह मनुष्यों को उनके विनाशकारी मनों पर छोड़ देता है ताकि वे ऐसे-ऐसे अप्राकृतिक काम करे जो अशोभनीय है, दुष्क्रिय, पीड़ादायक हैं, और लज्जाजनक हैं। यह आपके सामने प्रस्तुत इस नीतिवचन के अनुसार परमेश्वर के न्याय का सबसे स्पष्ट और सबसे चित्रात्मक प्रमाण है।

पाठक, आपके पास एक चुनाव है। एक सरल चुनाव! इस चुनाव के परिणाम या तो बेहद दर्दनाक हैं या फिर महिमामय सुख देनेवाले हैं। क्या आप चीजों को परमेश्वर के तरीके से करना चाहते हैं या अपने तरीके से? यदि आप अपना रास्ता चुनते हैं, तो स्वर्ग का धन्य परमेश्वर आपको आपके विपरीत मन पर छोड़ देगा ताकि आप सब प्रकार के अशोभनीय और लज्जाजनक काम करें, जैसा कि यह नीतिवचन घोषित करता है (मला 2:2-3)। यदि आप उसका मार्ग चुनते हैं, तो इसे बाइबल से सीखें और अपने प्रतिफल की कटनी करे (भजन 1:1-6; 19:1-11)। परमेश्वर की महिमा करे! उसके वचन के आगे थरथराएं! उस से दया के लिए याचना करें!

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