नीतिवचन 1:2

जिस से कि बुद्धि और शिक्षा का ज्ञान प्राप्त हो; समझ के वचनों को समझे;

सुलैमान ने नीतिवचन की पुस्तक क्यों लिखी? वह चाहता था कि मनुष्य के उद्देश्य और लाभ के विषय में उसकी अद्वितीय बुद्धिमत्ता, विलक्षण प्रयोगों और अन्तर्दुष्टि से प्राप्त अवलोकनों का लाभ आपको मिले। वह आपको बुद्धि, शिक्षा और समझ देना चाहता था।

क्या ही अद्भुत वरदान है! दाऊद ने कहा कि पवित्रशास्त्र मधु से भी मधुर, और बहुत अच्छे सोने से भी अधिक अनमोल है (भजन 19:10)। अय्यूब ने उसे अपने आवश्यक भोजन से भी अधिक महत्वपूर्ण जाना (अय्यूब 23:12)। प्रिय पाठक, आप इनके लिए कितने आभारी हैं? अब तक का सबसे बुद्धिमान राजा, राजाओं के राजा अर्थात् मसीह के सिद्ध सहयोग से, आपको निजी तौर पर जीवन के ज्ञान की शिक्षा देना चाहता है!

परमेश्वर ने सुलैमान को किसी भी अन्य मनुष्य की तुलना में अधिक बुद्धि और समझ प्रदान की (1 राजा 3:9-12)। और परमेश्वर ने उसे किसी भी अन्य मनुष्य की तुलना में विभिन्न चीजों के साथ प्रयोग करने का अवसर दिया, क्योंकि वह बहुत बुद्धिमान, समृद्ध, शक्तिशाली, और आकर्षक था, तथा शान्तिपूर्ण रीति से शासन करता था, जिस कारण उसके पास विभिन्न चीजों पर परीक्षण करने और उन में झांककर देखने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। उसने आपके लाभ के लिए अपनी बुद्धि और परीक्षणों की बातों को साझा करने के लिए संक्षिप्त और सारगर्भित कहावतों के स्वरूप में नीतिवचन की पुस्तक लिखी।

सुलैमान ने इसलिए लिखा ताकि वह अपनी महान बुद्धि और सामाजिक प्रयोगों को अपने पुत्र और राष्ट्र के साथ साझा कर सके (सभो. 12:9-12)। सभोपदेशक की पुस्तक, जो प्रेरणा से उस की असाधारण परिस्थिति से छांट कर ली गई जीवन की एक दार्शनिकता है, वह मनुष्य के जीवन के उद्देश्य के विषय में उस के सामाजिक परीक्षणों और अवलोकनों का वर्णन करती है। उसने वहां अपने कुछ बुद्धिमानिपूर्ण उत्तर दिए, परन्तु उसने अपने कई नीतिवचनों के माध्यम से प्राथमिक रूप से लोगों को, और परोक्ष रूप से आपको सिखाया।

सुलैमान जीवन में मूर्खता से बचने और यहोवा के भय तथा ज्ञान का मार्ग चुनने में अपने पुत्र और राष्ट्र की सहायता करने की उम्मिद कर रहा था। वह यह निर्देश और समझ प्रदान करने की आशा कर रहा था ताकि बुद्धिमान लोग परमेश्वर को और भी अधिक प्रसन्न करने और समृद्ध जीवन जीने के लिए उनका उपयोग कर सकें। वह उन्हें मूर्खता और पाप के फन्दों और गड्ढों से बचाना चाहता था।

इस नीतिवचन की शर्तें एक दुसरे से जुड़ी हुई हैं, या एक दुसरे का प्रतिनिधित्व करती हैं, और इस कारण उन्हें एक-दूसरे से पूरी तरह से अलग नहीं किया जाना है, परन्तु फिर भी आप उनके अर्थ के किसी भी रंग पर विचार कर सकते हैं जो उनके लिए अद्वितीय हैं। समान शब्दों के दोहराव का तात्पर्य वर्णित वस्तु की गुणवत्ता और मात्रा पर ज़ोर देने के लिए है (नीति. 1:1-6)। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, ये नीतिवचन मूल्यवान शिक्षा पाने के हर पहलू से ओतप्रोत हैं, जिसकी मनुष्य चाहत रखता है।

सुलैमान चाहता है कि आप बुद्धि को जानें, जो कि सही-सही परख करने की शक्ति है। बुद्धि जानती है कि किसी भी परिस्थिति में क्या करना है। यह सर्वोत्तम उद्देश्यों के लिए सर्वोत्तम साधनों का उचित उपयोग करना जानती है। यह भलाई को चुनना और बुराई का तिरस्कार करना और ऐसा करने के कारणों को जानती है (यशा.7:15-16)। वह आपको बाद में बताएगा कि बुद्धि सर्वोपरि है और यह आपके पास होनी ही चाहिए (नीति. 4:7)।

वह चाहता है कि आप निर्देश को जानें, जो कि बुद्धि, ज्ञान और समझ की शिक्षा है। वह शिक्षक होगा, और आप एक छात्र होंगे। क्या ही धन्य अवसर! निर्देश पाना शिक्षा और प्रशिक्षण का शैक्षणिक अनुशासन है (भजन. 32:8; यशा.28:26)। नीतिवचन की पुस्तक के बिना, आपको सफल जीवन जीने की शिक्षा कौन देगा?

वह चाहता है कि आप समझ को जान लें, जो कि यथार्थ परख करने की शक्ति है (1 राजा 3:9,11)। एक समझदार व्यक्ति किसी भी परिस्थिति या जानकारी को समझता है और उसे बूझ लेता है, ताकि उसकी प्रमुख विशेषताओं को ठीक-ठीक पहचान सके और उसकी कठिनाइयों, निहितार्थों और परिणामों के विषय में सही-सही ज्ञान प्राप्त कर सके। यह सही और ग़लत, सत्य और झूठ, ज्योति और अंधकार, सत्यनिष्ठा और कपट आदि के बिच विद्यमान भेदों को जानना है। यह उन चीजों को समझना और उनकी पुष्टि करना है जो सर्वोत्तम हैं (फिल. 1:9-11)।

यद्यपि आप इस संक्षिप्त नीतिवचन में ज्ञान और समझ के निर्देश पाने में बहुत दूर तक नहीं गए हैं, फिर भी आप सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी सबक के लिए आगे बढ़ सकते हैं। यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र को जानना ही समझ है (नीति 1:7; 9:10)। प्रिय पाठक, क्या आप आज प्रभु का भय मानते हैं? क्या आप बाइबल के पवित्र और भयावह परमेश्वर के सामने थरथराते हैं और अपने पूरे मन से उस की आज्ञा मानने और उसे प्रसन्न करने की खोज करते हैं? प्रभु के भय के बिना कोई विद्या, ज्ञान या समझ अस्तित्व में नहीं है।

यदि यह नींव अपनी जगह पर सही-सही डाली जाती है, तो अगला कर्तव्य यह है कि आप इन नीतिवचनों को अपने आप पर लागू करें, अर्थात उनका व्यवहारिक उपयोग करें। उपदेशक सुलैमान आपको सिखाने जा रहा है, परन्तु सीखने के लिए एक उत्साही, आशावादी, एकचित्त, खोजी और प्रार्थनामय छात्र की आवश्यकता होती है। क्या आप प्रत्येक नीतिवचन पर वैसी ही इच्छा और तीव्रता के साथ विचार करने और उसे आत्मसात करने के लिए तैयार हैं जितना कि आप किसी छिपे हुए ख़जाने की खोज करने के लिए होंगे (नीति. 2:4)? जो लोग वास्तव में बुद्धि की लालसा रखते हैं, वे स्वयं को इस महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पित कर देंगे (नीति. 18:1)।

बुद्धि और समझ का अंतिम स्रोत वह है जो पवित्र आत्मा द्वारा प्रभु यीशु मसीह के सामर्थ्य से सिखाया जाता है (कुलु.1:9-11)। बुद्धि और ज्ञान के सभी ख़जाने मसीह यीशु में पाए जाते हैं (कुलु. 2:3), इसलिए आप आनंद से जान सकते हैं कि आपको सुलैमान से भी महान कोई मिल गया है (मत्ती 12:42)। प्रभु का नाम धन्य माना जाए!

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