नीतिवचन 1:15

हे मेरे पुत्र, तू उनके संग मार्ग पर न चलना; उनके पथ से अपने पांवो को रोके रह:

बुद्धिमान व्यक्ति मूर्खों से दूर रहेगा। धर्मी मनुष्य पापियों से दूर रहेगा। यहां धोखा खाना आपको महंगा पड़ेगा; बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है (1 कुरिं 15:33)। ये नियम विशेष रूप से युवाओं के विषय में सच हैं, इसलिए सुलैमान ने अपने पुत्र को मूर्खों और विद्रोहियों के बुरे प्रभावों और पापपूर्ण जीवनशैलियों से बचने की शिक्षा दी। मित्रों का दबाव एक शक्तिशाली बल है। एक बुद्धिमान पिता अपने बच्चों को इससे बचाएगा, और वह अपने बच्चों को इसके विषय में शिक्षा देगा और इसके विरुद्ध चिताएगा ।

यहाँ के सन्दर्भ पर विचार करें। सुलैमान ने सबसे पहले नीतिवचन की पुस्तक के उद्देश्य का परिचय दिया : बुद्धि का उपदेश (नीति 1:1-6)। फिर उसने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए परमेश्वर का भय मानने और माता-पिता की आज्ञा मानने के प्रमुख सिद्धांतों को रेखांकित किया (नीति 1:7-9)। उसके बाद उसने मूर्खों के प्रलोभनों और खतरों का एक लंबा विवरण दिया (नीति 1:10-19)। और फिर उसने एक स्त्री के रूप में बुद्धि का व्यक्तित्वकरण करके समापन किया, जिस में युवा पुरुषों से उसकी सलाह और चेतावनियों पर ध्यान देने का अनुरोध किया गया है, या फिर नतीजे भुगतने की चेतावनी दी गई है (नीति 1:20-33)।

इस खंड का आरम्भ इस प्रकाश होता है, “हे मेरे पुत्र, जब पापी तुझे फुसलाएं, तो तू राज़ी मत होना” (नीति. 1:10)। इसका आरम्भ “यदि” पापी किसी जवान को फुसलाएंगे से नहीं, बल्कि “जब” पापी से होता है। वे उसे ललचाएंगे। यदि वह उनके साथ हो लेगा तो वे उसे लाभ पहुचाएंगे (नीति. 1:11-14)। लेकिन परिणाम उसकी इच्छा के विपरीत घातक होंगे और इसलिए बुद्धिमान बनने और सफल होने की आवश्यकता है (नीति 1:15-19)। मेरे पुत्र, तू राज़ी मत होना!

मूर्ख हमेशा दूसरों को अपनी दुष्टता में शामिल करने की ख़ोज में रहते हैं (नीति 1:10-19; 2:10-15)। वेश्याएं पुरुषों को पापमय यौन सुखों का आनंद लेने के लिए फुसलाती हैं (नीति 2:16-19; 5:3-21; 7:6-21; 9:13-18)। एक बुद्धिमान युवक इन दोनों को ठुकरा देगा। वह केवल बुद्धिमानों और धर्मियों के साथ मित्रता रखेगा (नीति 2:20-21), क्योंकि वह जानता है कि मुर्ख और दुष्ट मनुष्यों पर निश्चित ही दंड आएगा (नीति. 2:22)।

परमेश्वर चाहता है कि मसीही लोग अलग हो जाएं। इसका कारण सरल है – यह संसार परमेश्वर, सत्य, बुद्धि और धार्मिकता से घृणा करता है। किसी भी विषय पर बाइबल का एक मज़बूत पक्ष ले, और आप इसे जल्द ही अनुभव से जान लेंगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर चाहता है कि उसके लोग केवल उससे प्रेम करें और केवल उसके लिए जिएं। यह संसार आपको इस उद्देश्य से दूर रखने के लिए हर संभव प्रयास करेगा। संसार से मित्रता परमेश्वर से बैर रखना है (याकूब 4:4; 1 यूहन्ना 2:15-17)।

आप धोखा खा चूंके हैं इसका गम्भीर खतरा है। या तो आप यह सोचते हैं कि आप कुछ सांसारिक मित्रता को बचाए रख सकते हैं, या आप यह देखने के लिए अपना आत्म-परिक्षण नहीं करेंगे कि आप जीवन के कौन से क्षेत्र में इस संसार को अपने-आप को फुसलाने का अवसर दे रहे हैं। पौलुस ने बलपूर्वक लिखा, “धोखा न खाना, बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती हैं” (1 कुरिं 15:33)। आप भ्रष्ट हो जाओगे; या अधिक सम्भावना है, आप पहले से ही भ्रष्ट हो चुके हैं।

सांसारिक तत्वज्ञान या जीवन सांसारिक शैलीवाले मित्र आपको बर्बाद कर देंगे। वे आप पर दबाव डालेंगे कि आप पवित्र परमेश्वर का त्याग करें, यह विश्वास करे कि आप क्रमिक-विकास का नतिजा हैं, कि धार्मिक औपचारिकताएं पर्याप्त हैं, कि प्रेम सब कुछ स्वीकार्य बनाता है, कि आपको अपने मन की सुनना चाहिए, कि आपको अपने से भिन्न लोगों को स्वीकार करना चाहिए, कि सत्य का ज्ञान किसी को नहीं है, कि किसी एक विश्वास को थामे रहना अहंकारपूर्ण और विभाजनकारी है, या यह कि परमेश्वर को आपके पापों से कोई फर्क नहीं पड़ता।

यह नीतिवचन दो खतरों के विरुद्ध चेतावनी देता है – पापियों के साथ मित्रता में चलना, या उनकी जीवन शैली अपने लिए चुनना। बुद्धि का ज्ञान प्राप्त करने और धार्मिकता का अनुसरण करने के लिए, आपको सब से पहले समझौता करने वालों, मूर्खों या पापियों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बंधों से बचना होगा। यह बुनियादी आवश्यकता है। आपको उनकी जीवन शैली को भी ठुकराना होगा, क्योंकि उनकी गतिविधियों, दृष्टिकोण, तत्वज्ञान और लक्ष्यों को चुनना उतना ही भ्रष्ट और विनाशकारी है। उन से और उन के मार्गों से दूर रहे।

कौन-सा वह स्थान है जहां पर यह संसार आपको या आपके बच्चों को फुसला रहा है? यहां वे कुछ हथियार या संस्थान हैं जो परमेश्वर और धार्मिकता के लिए आपके प्रेम को भ्रष्ट कर देंगे : टेलीविजन, फिल्में, संगीत, पब्लिक स्कूले, समकालीन कलीसियाएं, सहकर्मी, जनमत, दोस्ताना पड़ोसी, बेस्टसेलर किताबें, धनवान और प्रसिद्ध व्यक्तियों की जीवन शैलियाँ, विज्ञापन, फैशन का प्रचलन, और बहुत कुछ।

यह संसार आपको या आपके बच्चों को कैसे फुसला रहा है? आपको यह यकीन दिलाने के लिए कि सांसारिक मित्रता स्वीकार्य हैं यहाँ नीचे उसके द्वारा प्रयुक्त प्रमुख तर्क हैं, वे तर्क देंगे कि : उन से वास्तव में आपको कोई हानि नहीं पहुंचेगी; देखों वे कितने अच्छे लोग हैं; आपको नरम-दिल होने की आवश्यकता है; हम कुछ बातों पर असहमत होने के लिए सहमत हो सकते हैं; भाई मुझे अपने पेशे में सफलता के लिए उनकी आवश्यकता है; सामाजिक सफलता के लिए मुझे उनकी आवश्यकता है; खुद को चर्च के दोस्तों तक सीमित रखना बहुत प्रतिबंधात्मक है; यही एकमात्र तरीका है जिससे मैं उन्हें सत्य के लिए जीत सकता हूँ; वे कई अन्य लोगों की तुलना में बेहतर हैं; और परमेश्वर हम सब से वैसे ही प्रेम करता है जैसे हम हैं। ये वे दस झूठ हैं जो आपका विनाश कर देंगे।

यदि बुद्धि और सफलता आपके लक्ष्य हैं, तो अवश्य है कि आप मूर्ख व्यक्तियों से और उन के तर्कों से बचे, क्योंकि वे आपको बर्बाद कर देंगे (नीति 13:20; 14:7; 28:7)। यह कोई सुझाव नहीं है; यह तो एक आज्ञा है। आपको किस हद तक जाना चाहिए? सुलैमान ने लिखा, “दुष्टों के पथ में मत बैठ, और बुराई के मार्ग में मत जा। उस से बचकर रह, उसके पास से मत जा, उस से फिर, और निकल जा” (नीति 4:14-15)।

यदि आपको ज्ञान और सफलता प्रिय है, तो अवश्य है कि बुद्धिमान और सफल व्यक्तियों के साथ संगति स्थापित की जाए। ये बुद्धिमान और सफल लोग कौन हैं? वे परमेश्वर की परिभाषाओं के अनुसार अच्छे लोग हैं जो उसका भय मानते हैं और बुद्धिमानीपूर्ण और पवित्रता का जीवन जीते हैं (नीति 13:20; भज. 119:63; तीतुस 1:8)। ऐसे मित्र आपको तब तब अमूल्य सलाह और सुधार प्रदान कर सकते हैं जब जब आपको इनकी आवश्यकता होगी (नीति 15:22; 27:5-6, 9-10, 17)। वे बुद्धि और धार्मिकता की ओर जाने में आपकी सहायता करेंगे, ना कि आपको उनसे दूर ले जाएंगे जैसा कि इस संसार के मित्र ले जाते हैं।

यह नीतिवचन धार्मिक संगतियों पर भी लागू होता है। आपको ऐसे किसी भी व्यक्ति की पहचान करनी होगी जो पौलुस के सुसमाचार से भिन्न हो (रोमियों 16:17-18)। और आप उचित रूप से किसी भी ऐसे व्यक्ति को शाप दे सकते हैं जो एक अलग सुसमाचार का प्रचार करता है (गल 1:6-9)। आपको उन लोगों से दूर होना होगा जो उसकी प्रेरितीय परम्परा का उल्लंघन करते हैं (2 थिस्स. 3:6; 1 तीमु. 6:3-5)। और आपको समकालीन मसीहियों से दूर होना है (2 तीमु: 3:1-5), क्योंकि उनमें से अधिकांश खुशी-खुशी समझौता करते हैं (2 तीमु: 4:3-4)। प्रत्येक विश्वासी का यह कर्तव्य है कि वह प्रेरितीय विश्वास के लिए दृढ़ता से संघर्ष करे (यहूदा 1:3)।

मित्र अच्छे होते हैं, यदि वे अच्छे मित्र हैं। परन्तु अच्छे मित्रों की पहचान केवल परमेश्वर के प्रति उनके भय और धर्मी जीवन से ही की जाती हैं। ऐसे मित्र कहां मिलते हैं? प्रभु यीशु मसीह की एक सच्ची कलीसिया में, जहां संसार और उसके सभी समझौते और आविष्कार ठुकरा दिए जाते हैं। वहाँ प्रेरितीय सुसमाचार और प्रेरित धर्मग्रंथों का शुद्ध सत्य और ज्ञान ऊंचा किया जाता है, उसका बचाव किया जाता है, और साहस तथा स्पष्टता से सिखाया जाता है। इस नियम को लेकर आप अपने जीवन में कहाँ खड़े हैं?

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