नीतिवचन की व्याख्या

1. याकीह के बेटे आगूर के वचन, अर्थात् नबूवत जो उसने एतियाल, अर्थात् एतियाल और यूक़ाल से कही। (केजेवी)

2. निश्चय मैं पशु सरीखा हूँ, वरन् मनुष्य कहलाने के योग्य भी नहीं; और मनुष्य की समझ मुझ में नहीं है।

4. कौन स्वर्ग पर चढ़कर गया अथवा उतर आया? किसने पवन को अपनी मुट्ठी में इकठ्ठा किया? किसने जलों को वस्त्र में बांधा? किसने पृथ्वी की सारी सीमाओं को स्थापित किया? यदि तू बता सके, उसका नाम क्या और उसके बेटे का नाम क्या?

6. उसके वचनों में कुछ मत बढ़ा, ऐसा न हो कि वह तुझे डाँटे और तू झूठा ठहरे।

7. मैंने तुझ से दो बातें चाही हैं; सो मेरे मरने से पहले उन्हें मुझे देने से इन्कार न कर।

9. ऐसा न हो कि जब मेरा पेट भर जाए, तब मैं इन्कार करके कहूँ कि यहोवा कौन है? या अपना भाग खोकर चोरी करूँ, और अपने परमेश्वर का नाम अनुचित रीति से लूँ।

10. किसी दास की, उसके स्वामी से चुगली न करना, ऐसा न हो कि वह तुझे शाप दे, और तू दोषी ठहराया जाए।

11. ऐसी एक पीढ़ी हैं, जो अपने पिता को शाप देती और अपनी माता को धन्य नहीं कहती।

12. ऐसी पीढ़ी है जो अपनी दृष्टि में शुद्ध है, तौभी उनका मैल धोया नहीं गया।

13. एक पीढ़ी के लोग ऐसे हैं – उनकी दृष्टि क्या ही घमण्ड से भरी रहती है, और उनकी आँखें कैसी चढ़ी हुई रहती हैं।

14. एक पीढ़ी के लोग ऐसे हैं, जिनके दाँत तलवार और उनकी दाढ़ें छुरियाँ हैं, जिनसे वे दीन लोगों को पृथ्वी पर से, और दरिद्रों को मनुष्यों में से मिटा डालें।

15. जैसे जोंक की दो बेटियाँ होती हैं, जो कहती हैं, “दे दे,” वैसे ही तीन वस्तुएँ हैं, जो तृप्त नहीं होती; वरन् चार हैं, जो कभी नहीं कहतीं, “बस।”

16. अधोलोक और बांझ की कोख, भूमि जो जल पी पीकर तृप्त नहीं होती, और आग जो कभी नहीं कहती, ‘बस’।

17. जिस आँख से कोई अपने पिता पर अनादर की दृष्टि करे, और अपमान के साथ अपनी माता की आज्ञा न माने, उस आँख को तराई के कौवे खोद खोदकर निकालेंगे, और उकाब के बच्चे खा डालेंगे।

18. तीन बातें हैं जो आश्चर्यजनक हैं, हाँ चार जिन्हें मैं नहीं जानता।

19. आकाश में उकाब पक्षी का मार्ग, चट्टान पर सर्प की चाल, समुद्र में जहाज़ की चाल, और कन्या के संग पुरुष की चाल।

20. व्यभिचारिणी की चाल भी वैसी ही है; वह भोजन करके मुँह पोंछती, और कहती है, मैं ने कोई अनर्थ काम नहीं किया।

21. तीन बातों के कारण पृथ्वी काँपती है; वरन् चार हैं, जो उससे सही नहीं जातीं;

23. घिनौनी स्त्री का ब्याहा जाना, और दासी का अपनी स्वामिन की वारिस होना।

24. पृथ्वी पर चार छोटे जन्तु हैं, जो अत्यन्त बुद्धिमान हैं :

25. चींटियाँ निर्बल जाति तो हैं, परन्तु धूपकाल में अपनी भोजनवस्तु बटोरती हैं;

26. बिज्जू निर्बल हैं, तौभी उनकी मान्दें पहाड़ों पर होती हैं;

28. और मकड़ी जो अपने पाओं से पकड़ती है, तौभी राजभवनों में रहती है।

29. तीन सुन्दर चालवाले प्राणी हैं; वरन् चार हैं, जिन की चाल सुन्दर है :

30. सिंह जो सब पशुओं में पराक्रमी है, और किसी के डर से नहीं हटता;

31. शिकारी कुत्ता और बकरा; और अपनी सेना समेत राजा, जिसके विरोध में कोई उठ नहीं पाता।

32. यदि तूने अपनी प्रशंसा करने की मूर्खता की है, यदि तूने दुष्कर्म करने का षडयंत्र रचा है, तो अपने मुंह पर हाथ रख।

33. क्योंकि जैसे दूध के मथने से मक्खन, और नाक के मरोड़ने से लहू निकलता है, वैसे ही क्रोध के भड़काने से झगड़ा उत्पन्न होता है।

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