नीतिवचन की व्याख्या

1. क्या बुद्धि नहीं पुकारती है? और क्या समझ अपनी आवाज़ को ऊँचा नहीं करती है? (केजेवी)

2. वह तो ऊँचे स्थानों पर मार्ग की एक ओर और तिर्मुहानियों में खड़ी होती है;

3. फाटकों के पास, नगर के पैठाव में, और द्वारों ही में वह ऊँचे स्वर से कहती है:

5. हे भोलो, चतुराई सीखो; और हे मूर्खो, अपने मन में समझ लो।

7. क्योंकि मुझ से सच्चाई की बातों का वर्णन होगा; दुष्टता की बातों से मुझ को घृणा आती है।

8. मेरे मुँह की सब बातें धर्म की होती हैं, उन में से कोई टेढ़ी या उलट फेर की बात नहीं निकलती है।

9. समझवाले के लिये वे सब सहज, इस कारण ज्ञान प्राप्त करनेवालों के लिये अति सीधी हैं।

11. क्योंकि बुद्धि मूँगे से भी अच्छी है, और सारी मनभावनी वस्तुओं में कोई भी उसके तुल्य नहीं है।

12. मैं जो बुद्धि हूँ, चतुराई में वास करती हूँ, और ज्ञान और विवेक को प्राप्त करती हूँ।

13. बुराई से घिन करना परमेश्वर का भय है, और मैं अहंकारी और अभिमानी और कुमार्ग और हठीले मुंह से बैर रखती हूँ। (केजेवी)

14. उत्तम युक्ति, और खरी बुद्धि मेरी ही है, मैं तो समझ हूँ, और पराक्रम भी मेरा है।

15. मुझ से राजा राज्य करते हैं; और राजपुत्र न्याय का आदेश देते हैं।

17. जो मुझ से प्रेम रखते हैं, उनसे मैं भी प्रेम रखती हूँ, और जो मुझ को यत्न से तड़के उठकर खोजते हैं, वे मुझे पाते हैं।

19. मेरा फल चोखे सोने से, वरन् कुन्दन से भी उत्तम है, और मेरी उपज उत्तम चाँदी से अच्छी है।

20. मैं धर्म के मार्ग में, और न्याय की डगरों के बीच में चलाती हूँ,

21. जिससे मैं अपने प्रेमियों को परमार्थ का भागी करूँ, और उनके भण्डारों को भर दूँ।

23. मैं सदा से वरन् आदि ही से पृथ्वी की सृष्टि से पहले ही से ठहराई गई हूँ।

24. जब न तो गहिरा सागर था और न जल के सोते थे, तब ही से मैं उत्पन्न हुई।

25. पहाड़ों के स्थिर होने से पहिले और पहाड़ियों के आने से पहले मैं उत्पन्न हुई।

26. जब यहोवा ने न तो पृथ्वी और न मैदान, न जगत की धूलि के परमाणु बनाए थे, इनसे पहले मैं उत्पन्न हुई।

27. जब उसने आकाश को स्थिर किया, तब मैं वहाँ थी, जब उसने गहिरे सागर के ऊपर आकाशमण्डल ठहराया,

28. जब उसने आकाशमण्डल को ऊपर से स्थिर किया, और गहिरे सागर के सोते फूटने लगे,

29. जब उसने समुद्र की सीमा ठहराई, कि जल उसकी आज्ञा का उल्लंघन न कर सके, और जब वह पृथ्वी की नींव की डोरी लगाता था,

30. तब मैं कारीगर सी उसके पास थी; और प्रतिदिन मैं उसकी प्रसन्नता थी, और हर समय उसके सामने आनन्दित रहती थी।

31. मैं उसकी बसाई हुई पृथ्वी से प्रसन्न थी और मेरा सुख मनुष्यों की संगति से होता था।

32. इसलिये अब हे मेरे पुत्रो, मेरी सुनो; क्या ही धन्य हैं वे जो मेरे मार्ग को पकड़े रहते हैं।

33. उपदेश सुनो, और बुद्धिमान बनो, और उसे मत नकारों। (केजेवी)

34. धन्य है वह मनुष्य जो मेरी सुनता है, और जो प्रतिदिन मेरे फाटकों पर दृष्टी लगाए रहता है, और मेरे द्वारों के खम्बों के पास बाट जोहता है। (केजेवी)

35. क्योंकि जो मुझे पाता है, वह जीवन को पाता है, और यहोवा उससे प्रसन्न होता है।

36. परन्तु जो मेरे विरुद्ध अपराध करता है, वह अपने ही पर उपद्रव करता है; जितने मुझ से बैर रखते वे मृत्यु से प्रीति रखते हैं।

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