नीतिवचन की व्याख्या

1. हे मेरे बेटे, मेरी व्यवस्था को मत भूल, परन्तु तेरा मन मेरी आज्ञाओं का पालन करे : (केजेवी)

2. क्योंकि वे दिनों की बढ़ती और जीवन के वर्ष और कुशल तुझे देंगे। (KJV)

3. कृपा और सच्चाई तुझ से अलग न होने पाएँ; वरन् उनको अपने गले का हार बनाना, और अपनी हृदयरूपी पटिया पर लिखना।

4. तो तू परमेश्वर और मनुष्य दोनों का अनुग्रह पाएगा, तू अति बुद्धिमान होगा।

5. तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना।

6. अपने सारे मार्गों में उसे मान ले, और वह तेरी चाल को सुधारेगा।

7. अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न होना; यहोवा का भय मानना, और बुराई से अलग रहना।

8. ऐसा करने से तेरी नाभि भली चंगी, और तेरी हड्डियाँ पुष्ट रहेंगी।

9. अपनी संपत्ति के द्वारा, और अपनी भूमि की सारी पहली उपज दे देकर यहोवा की प्रतिष्ठा करना

10. इस प्रकार तेरे खत्ते भरे पूरे रहेंगे, और तेरे रसकुण्डों से नया दाखमधु उमण्डता रहेगा।

11. हे मेरे पुत्र, यहोवा की शिक्षा से मुँह न मोड़ना, और जब वह तुझे डाँटे, तब तू बुरा न मानना,

12. क्योंकि यहोवा जिस से प्रेम रखता है उसको डाँटता है, जैसे कि बाप उस बेटे को जिसे वह अधिक चाहता है।

13. सुखी है वह मनुष्य जिसने बुद्धि को प्राप्त किया, और वह मनुष्य जिसने समझ को पाया।

14. क्योंकि उसका व्यापार चांदी के व्यापार से और उसका लाभ चोखे सोने के लाभ से अच्छा है।

18. जो बुद्धि को ग्रहण कर लेते हैं, उनके लिये वह जीवन का वृक्ष बनती है; और जो उसको पकड़े रहते हैं, वह धन्य हैं।

19. यहोवा ने पृथ्वी की नींव बुद्धि ही से डाली; और स्वर्ग को समझ ही के द्वारा स्थिर किया।

20. उसी के ज्ञान के द्वारा गहिरे सागर फूट निकले, और आकाशमण्डल से ओस टपकती है।

21. हे मेरे पुत्र, ये बातें तेरी दृष्टि की ओट में न होने पाएँ, खरी बुद्धि और विवेक की रक्षा कर।

22. तब इन से तेरे प्राण को जीवन मिलेगा, और ये तेरे गले का अनुग्रह बनेंगे।

23. तब तू अपने मार्ग पर निडर चलेगा, और तेरे पाँव में ठेस न लगेगी।

24. जब तू लेटेगा, तब भय न खाएगा, जब तू लेटेगा, तब सुख की नींद आएगी।

25. अचानक आनेवाले भय से न डरना, और जब दुष्टों पर विपत्ति आ पड़े, तब न घबराना;

28. तेरे पास होते हुए भी अपने पडोसी से मत कह की जा, फिर आ, और मैं कल दूंगा। (केजेवी)

29. जब तेरा पड़ोसी तेरे पास बेखटके रहता है, तब उसके विरुद्ध बुरी युक्ति न बाँधना।

30. जिस मनुष्य ने तुझ से बुरा व्यवहार न किया हो, उससे अकारण मुक़द्दमा खड़ा न करना।

35. बुद्धिमान महिमा को पाएँगे, परन्तु मूर्खों की बढ़ती अपमान ही की होगी।

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