नीतिवचन की व्याख्या
1. कल की बड़ाई आज मत कर; क्योंकि तू नहीं जानता कि दिनभर में क्या होगा। (केजेवी)
2. तेरी प्रशंसा और लोग करें तो करें, परन्तु तू आप न करना; दूसरा तुझे सराहे तो सराहे, परन्तु तू अपनी सराहना न करना।
3. पत्थर तो भारी है, और बालू बोझिल, परन्तु मूढ़ का कोप दोनों से भी भारी है।
4. क्रोध तो क्रूर, और प्रकोप धारा के समान होता है, परन्तु जब कोई जल उठता है, तब कौन ठहर सकता है।
5. खुली हुई डाँट गुप्त प्रेम से उत्तम है।
6. जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वासयोग्य हैं, परन्तु बैरी के चुम्बन धोखा देनेवाले होते हैं।
7. सन्तुष्ट होने पर मधु का छत्ता भी फीका लगता है परन्तु भूखे को सब कड़वी वस्तुएँ भी मीठी जान पड़ती हैं।
8. जो मनुष्य अपने स्थान से भ्रमता है, वह उस चिड़िया के समान है जो अपने घोंसले से भ्रमती है।
10. जो तेरा और तेरे पिता का भी मित्र हो उसे न छोड़ना, और अपनी विपत्ति के दिन अपने भाई के घर न जाना। प्रेम करनेवाला पड़ोसी, दूर रहनेवाले भाई से कहीं उत्तम है।
11. हे मेरे पुत्र, बुद्धिमान होकर मेरा मन आनन्दित कर, तब मैं अपने निन्दा करनेवाले को उत्तर दे सकूँगा।
12. बुद्धिमान मनुष्य विपत्ति को आते देखकर छिप जाता है; परन्तु भोले लोग आगे बढ़े चले जाते और हानि उठाते हैं।
13. जो पराए का उत्तरदायी हो उसका कपड़ा, और जो अनजान का उत्तरदायी हो उससे बन्धक की वस्तु ले ले।
15. वर्षा ऋतु में पानी का लगातार बरसना, और झगड़ालू पत्नी, दोनों कष्टदायक हैं।
16. जो उसे छिपाता है सो पवन को छिपाता है, अथवा दाहिने हाथ की सुगंध जो आप ही प्रकट होती है।
17. जैसे लोहा लोहे को चमका देता है, वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है।
18. जो अंजीर के पेड़ की रक्षा करता है वह उसका फल खाता है, इसी रीति से जो अपने स्वामी की सेवा करता उसकी महिमा होती है।
19. जैसे जल में मुख की परछाई मुख को प्रगट करती है, वैसे ही मनुष्य का मन मनुष्य को प्रगट करता है।
20. जैसे अधोलोक और विनाशलोक, वैसे ही मनुष्य की आँखें भी तृप्त नहीं होतीं।
21. जिस रीति से चांदी के लिए घड़िया और सोने के लिए भट्ठी है, उसी रीति से मनुष्य के लिए उसकी बढ़ाई है।
22. चाहे तू मूर्ख को अनाज के बीच ओखली में डालकर मूसल से कूटे, तौभी उसकी मूर्खता नहीं जाने की।
23. अपनी भेड़-बकरियों की दशा भली-भांति मन लगाकर जान ले, और अपने सब पशुओं के झुण्डों की देखभाल उचित रीति से कर।
24. क्योंकि सम्पत्ति सदा नहीं ठहरती; और क्या राजमुकुट पीढ़ी से पीढ़ी तक बना रहता है?
25. जब कटी हुई घास उठा ली जाती, और नई घास दिखाई देती, और पहाड़ों की हरियाली काटकर इकट्ठी की जाती है;
26. तब भेड़ों के बच्चे तेरे वस्त्र के लिये होंगे, और बकरों के द्वारा खेत का मूल्य दिया जाएगा;
27. और बकरियों का दूध इतना होगा कि तू अपने घराने समेत पेट भरके पिया करेगा, और तेरी दासियों का भी जीवन निर्वाह होता रहेगा।
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1. कल की बड़ाई आज मत कर; क्योंकि तू नहीं जानता कि दिनभर में क्या होगा। (केजेवी)
2. तेरी प्रशंसा और लोग करें तो करें, परन्तु तू आप न करना; दूसरा तुझे सराहे तो सराहे, परन्तु तू अपनी सराहना न करना।
3. पत्थर तो भारी है, और बालू बोझिल, परन्तु मूढ़ का कोप दोनों से भी भारी है।
4. क्रोध तो क्रूर, और प्रकोप धारा के समान होता है, परन्तु जब कोई जल उठता है, तब कौन ठहर सकता है।
5. खुली हुई डाँट गुप्त प्रेम से उत्तम है।
6. जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वासयोग्य हैं, परन्तु बैरी के चुम्बन धोखा देनेवाले होते हैं।
7. सन्तुष्ट होने पर मधु का छत्ता भी फीका लगता है परन्तु भूखे को सब कड़वी वस्तुएँ भी मीठी जान पड़ती हैं।
8. जो मनुष्य अपने स्थान से भ्रमता है, वह उस चिड़िया के समान है जो अपने घोंसले से भ्रमती है।
10. जो तेरा और तेरे पिता का भी मित्र हो उसे न छोड़ना, और अपनी विपत्ति के दिन अपने भाई के घर न जाना। प्रेम करनेवाला पड़ोसी, दूर रहनेवाले भाई से कहीं उत्तम है।
11. हे मेरे पुत्र, बुद्धिमान होकर मेरा मन आनन्दित कर, तब मैं अपने निन्दा करनेवाले को उत्तर दे सकूँगा।
12. बुद्धिमान मनुष्य विपत्ति को आते देखकर छिप जाता है; परन्तु भोले लोग आगे बढ़े चले जाते और हानि उठाते हैं।
13. जो पराए का उत्तरदायी हो उसका कपड़ा, और जो अनजान का उत्तरदायी हो उससे बन्धक की वस्तु ले ले।
15. वर्षा ऋतु में पानी का लगातार बरसना, और झगड़ालू पत्नी, दोनों कष्टदायक हैं।
16. जो उसे छिपाता है सो पवन को छिपाता है, अथवा दाहिने हाथ की सुगंध जो आप ही प्रकट होती है।
17. जैसे लोहा लोहे को चमका देता है, वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है।
18. जो अंजीर के पेड़ की रक्षा करता है वह उसका फल खाता है, इसी रीति से जो अपने स्वामी की सेवा करता उसकी महिमा होती है।
19. जैसे जल में मुख की परछाई मुख को प्रगट करती है, वैसे ही मनुष्य का मन मनुष्य को प्रगट करता है।
20. जैसे अधोलोक और विनाशलोक, वैसे ही मनुष्य की आँखें भी तृप्त नहीं होतीं।
21. जिस रीति से चांदी के लिए घड़िया और सोने के लिए भट्ठी है, उसी रीति से मनुष्य के लिए उसकी बढ़ाई है।
22. चाहे तू मूर्ख को अनाज के बीच ओखली में डालकर मूसल से कूटे, तौभी उसकी मूर्खता नहीं जाने की।
23. अपनी भेड़-बकरियों की दशा भली-भांति मन लगाकर जान ले, और अपने सब पशुओं के झुण्डों की देखभाल उचित रीति से कर।
24. क्योंकि सम्पत्ति सदा नहीं ठहरती; और क्या राजमुकुट पीढ़ी से पीढ़ी तक बना रहता है?
25. जब कटी हुई घास उठा ली जाती, और नई घास दिखाई देती, और पहाड़ों की हरियाली काटकर इकट्ठी की जाती है;
26. तब भेड़ों के बच्चे तेरे वस्त्र के लिये होंगे, और बकरों के द्वारा खेत का मूल्य दिया जाएगा;
27. और बकरियों का दूध इतना होगा कि तू अपने घराने समेत पेट भरके पिया करेगा, और तेरी दासियों का भी जीवन निर्वाह होता रहेगा।
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