खान-पान

क्या खाने-पीने से कोई फर्क पड़ता है? आप कितना खाते-पीते हैं? क्या खाते हैं? कब? कहाँ? किसके साथ? हाँ, इन सब से फर्क पड़ता है! परमेश्वर ने सुलैमान को प्रेरित किया कि वह खान-पान के कुछ ऐसे नियम लिखे जो बुद्धि का ही एक भाग हैं। यदि आप इन नियमों को सीखकर अपने जीवन में उतार लें, तो इससे ऐसी आशीषें मिलेंगी जो केवल शारीरिक स्वास्थ्य से कहीं बढ़कर हैं। परमेश्वर के वचन और नीतिवचन की इस अनोखी व्यावहारिकता की सराहना कीजिए।

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