नीतिवचन की व्याख्या
2. क्योंकि उनके मन विनाश सोचते रहते हैं, और उनके मुँह से दुष्टता की बात निकलती है।
4. ज्ञान के द्वारा कोठरियाँ सब प्रकार की बहुमूल्य और मनोहर वस्तुओं से भर जाती हैं।
5. बुद्धिमान पुरुष बलवान् भी होता है, और ज्ञानी जन अधिक शक्तिमान् होता है।
7. बुद्धि मूर्ख के लिये अति उंची है, वह फाटक पर अपना मुंह नहीं खोलता।
8. जो सोच विचार के बुराई करता है, उसको लोग दुष्ट कहते हैं।
9. मूर्खता का विचार भी पाप है, और ठट्ठा करनेवाले से मनुष्य घृणा करते हैं।
10. यदि तू विपत्ति के समय साहस छोड़ दे, तो तेरी शक्ति बहुत कम है।
11. जो मार डाले जाने के लिये घसीटे जाते हैं उनको छुड़ा; और जो घात किए जाने को हैं उन्हें मत पकड़ा।
12. यदि तू कहे कि देखो हम जानते न थे; तो क्या वह जो अंतःकरण को जांचता है, यह नहीं सोचेगा? और जो तेरे प्राण का रक्षक है सो क्या नहीं जानता? और क्या मनुष्य को उसके कार्य के समान पलटा न देगा? (केजेवी)
14. इसी रीति बुद्धि से प्राप्त ज्ञान तेरे प्राण को वैसा ही मीठा लगेगा; यदि तू उसे पा जाए तो अन्त में उसका फल भी मिलेगा, और तेरी आशा न टूटेगी।
15. हे दुष्ट, तू धर्मी के निवास को नष्ट करने के लिये घात में न बैठ; और उसके विश्रामस्थान को मत उजाड़;
16. क्योंकि धर्मी चाहे सात बार गिरे तौभी उठ खड़ा होता है; परन्तु दुष्ट लोग विपत्ति में गिरकर पड़े ही रहते हैं।
17. जब तेरा बैरी गिर पड़े तो आनन्दित मत हो, और जब वह ठोकर खाए तेरा मन मगन न होने पाए : (केजेवी)
18. कहीं ऐसा न हो कि यहोवा यह देखकर अप्रसन्न हो, और अपना क्रोध उस पर से हटा ले।
19. कुकर्मियों के कारण मत कुढ़, दुष्ट लोगों के कारण डाह न कर;
21. हे मेरे पुत्र, यहोवा और राजा दोनों का भय मानना; और बलवा करनेवालों के साथ न मिलना;
22. क्योंकि उन पर विपत्ति अचानक आ पड़ेगी, और दोनों की ओर से आनेवाली विपत्ति को कौन जानता है
23. बुद्धिमानों के वचन यह भी हैं। न्याय में पक्षपात करना, किसी रीति भी अच्छा नहीं।
24. जो दुष्ट से कहता है कि तू निर्दोष है, उसको तो हर समाज के लोग शाप देते और देश-देश उससे घृणा करते हैं;
25. किन्तु दुर्जन को डांटनेवाले न्यायाधीश जनता की दृष्टि में आदरणीय होंगे, उन पर शुभ आशिषों की वर्षा होगी।
26. जो ठीक उत्तर देता है उसके होंठ चूमे जायेंगे।
27. अपना बाहर का काम–काज ठीक करना, और खेत का काम तैयार कर लेना; उसके बाद अपना घर बनाना।
28. अपने पड़ोसी के विरुद्ध अकारण साक्षी मत हो; और अपने होंठों से छल मत कर।
29. मत कह, “जैसा उसने मेरे साथ किया वैसा ही मैं भी उसके साथ करूँगा; और उसको उसके काम के अनुसार बदला दूँगा।”
30. मैं आलसी के खेत के पास से और निर्बुद्धि मनुष्य की दाख की बारी के पास से होकर जाता था,
31. तो क्या देखा कि वहाँ सब कहीं कंटीले पेड़ भर गए हैं; और वह बिच्छू पौधों से ढँक गई है; और उसके पत्थर का बाड़ा गिर गया है
32. तब मैं ने देखा और उस पर ध्यानपूर्वक विचार किया; हाँ, मैं ने देखकर शिक्षा प्राप्त की।
33. छोटी सी नींद, एक और झपकी, थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के और लेटे रहना,
34. तब तेरा कंगालपन डाकू के समान, और तेरी घटी हथियारबन्द मनुष्य के समान आ पड़ेगी।
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2. क्योंकि उनके मन विनाश सोचते रहते हैं, और उनके मुँह से दुष्टता की बात निकलती है।
4. ज्ञान के द्वारा कोठरियाँ सब प्रकार की बहुमूल्य और मनोहर वस्तुओं से भर जाती हैं।
5. बुद्धिमान पुरुष बलवान् भी होता है, और ज्ञानी जन अधिक शक्तिमान् होता है।
7. बुद्धि मूर्ख के लिये अति उंची है, वह फाटक पर अपना मुंह नहीं खोलता।
8. जो सोच विचार के बुराई करता है, उसको लोग दुष्ट कहते हैं।
9. मूर्खता का विचार भी पाप है, और ठट्ठा करनेवाले से मनुष्य घृणा करते हैं।
10. यदि तू विपत्ति के समय साहस छोड़ दे, तो तेरी शक्ति बहुत कम है।
11. जो मार डाले जाने के लिये घसीटे जाते हैं उनको छुड़ा; और जो घात किए जाने को हैं उन्हें मत पकड़ा।
12. यदि तू कहे कि देखो हम जानते न थे; तो क्या वह जो अंतःकरण को जांचता है, यह नहीं सोचेगा? और जो तेरे प्राण का रक्षक है सो क्या नहीं जानता? और क्या मनुष्य को उसके कार्य के समान पलटा न देगा? (केजेवी)
14. इसी रीति बुद्धि से प्राप्त ज्ञान तेरे प्राण को वैसा ही मीठा लगेगा; यदि तू उसे पा जाए तो अन्त में उसका फल भी मिलेगा, और तेरी आशा न टूटेगी।
15. हे दुष्ट, तू धर्मी के निवास को नष्ट करने के लिये घात में न बैठ; और उसके विश्रामस्थान को मत उजाड़;
16. क्योंकि धर्मी चाहे सात बार गिरे तौभी उठ खड़ा होता है; परन्तु दुष्ट लोग विपत्ति में गिरकर पड़े ही रहते हैं।
17. जब तेरा बैरी गिर पड़े तो आनन्दित मत हो, और जब वह ठोकर खाए तेरा मन मगन न होने पाए : (केजेवी)
18. कहीं ऐसा न हो कि यहोवा यह देखकर अप्रसन्न हो, और अपना क्रोध उस पर से हटा ले।
19. कुकर्मियों के कारण मत कुढ़, दुष्ट लोगों के कारण डाह न कर;
21. हे मेरे पुत्र, यहोवा और राजा दोनों का भय मानना; और बलवा करनेवालों के साथ न मिलना;
22. क्योंकि उन पर विपत्ति अचानक आ पड़ेगी, और दोनों की ओर से आनेवाली विपत्ति को कौन जानता है
23. बुद्धिमानों के वचन यह भी हैं। न्याय में पक्षपात करना, किसी रीति भी अच्छा नहीं।
24. जो दुष्ट से कहता है कि तू निर्दोष है, उसको तो हर समाज के लोग शाप देते और देश-देश उससे घृणा करते हैं;
25. किन्तु दुर्जन को डांटनेवाले न्यायाधीश जनता की दृष्टि में आदरणीय होंगे, उन पर शुभ आशिषों की वर्षा होगी।
26. जो ठीक उत्तर देता है उसके होंठ चूमे जायेंगे।
27. अपना बाहर का काम–काज ठीक करना, और खेत का काम तैयार कर लेना; उसके बाद अपना घर बनाना।
28. अपने पड़ोसी के विरुद्ध अकारण साक्षी मत हो; और अपने होंठों से छल मत कर।
29. मत कह, “जैसा उसने मेरे साथ किया वैसा ही मैं भी उसके साथ करूँगा; और उसको उसके काम के अनुसार बदला दूँगा।”
30. मैं आलसी के खेत के पास से और निर्बुद्धि मनुष्य की दाख की बारी के पास से होकर जाता था,
31. तो क्या देखा कि वहाँ सब कहीं कंटीले पेड़ भर गए हैं; और वह बिच्छू पौधों से ढँक गई है; और उसके पत्थर का बाड़ा गिर गया है
32. तब मैं ने देखा और उस पर ध्यानपूर्वक विचार किया; हाँ, मैं ने देखकर शिक्षा प्राप्त की।
33. छोटी सी नींद, एक और झपकी, थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के और लेटे रहना,
34. तब तेरा कंगालपन डाकू के समान, और तेरी घटी हथियारबन्द मनुष्य के समान आ पड़ेगी।
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